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नीतियां क्यों आवश्यक हैं? अनेक बार अपने कथन सशक्त बनाने के लिए युक्ति, तर्क एवं नीति का सहारा लिया जाता है। अनेक बार सामाजिक व्यवहार बहुत कठिन या दुविधात्मक हो जाता है तो उस समय ज्ञान ही युक्ति बन जाता है। नीतियां या उनके निष्कर्ष विशुद्ध ज्ञान हैं। नीतियां व्यक्तिगत न हो कर अ-व्यक्तिगत (impersonal) होती हैं। रामचरित मानस में नीतियां भरी पड़ी हैं और महाकवि ने अपनी बात समझाने के लिए या अंतर्द्वंद्व के निराकरण के लिए इनका खूब प्रयोग किया है। रामचरित मानस की नीतियों का संकलन करें तो यह अपने आप में एक treatise of philosophy बन जायेगा। जब किसी व्यक्ति को कर्तव्य बोध कराना हो, या उसकी अनीतिपूर्ण बात को उजागर करना हो तो नीति या लोक ज्ञान बहुत उपयोगी होता है। इस वीडियो में कवि बिहारी द्वारा राजा जयसिंह को कर्तव्य प्रेरणा देने और जांबवान द्वारा हनुमान जी को प्रेरित करने के उदहारण से मैंने बताने का प्रयास किया है कि श्रोता के स्तर और श्रोता वक्ता के बीच के सम्बन्ध इसका निर्णय कराते हैं की बातें डायरेक्ट कही जाएं या युक्ति और ज्ञान का आश्रय ले कर ! शूर्पणखा को लक्ष्मण सीधे सीधे इंकार न करके लोकनीति कहते हैं - सेवक के नसीब में सुख नहीं होता तो सेवक की पत्नी या प्रेमिका को कैसे सुख मिल सकता है। संकेत है यह छोड़ दो। Mind your own business! वीडियो का दूसरा प्रसंग भी अरण्यकाण्ड से है। श्रीरामजी लक्ष्मण को उनकी आत्मग्लानि से बाहर निकालने के लिए नीति और लोकज्ञान का सहारा ले कर कहते हैं कि - स्त्री , शास्त्र और राजा को कभी भी अपने वश में नहीं समझना चाहिए। Don't take them (A ruler, a scripture and a young woman) for granted. याद रखने की बात है - श्रीराम ने स्वर्ण मृग आखेट के समय सुरक्षा का निर्देश लक्ष्मण जी को दिया था - सीता जी को कोई निर्देश नहीं था। रामचरित मानस में जब जब कथानक में कोई दुरूहता या द्वंद्व की स्थित आयी है - महाकवि ने नीतियों के माध्यम से कथानक को आगे बढ़ाया है और यही इस काव्य का असली सौंदर्य है। @uniqueanglebysantosh @HindiKavita @indianbooktuberarohi2552