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सफल विवाह की घोषणा कर देते हैं, किन्तु यह पूर्ण सत्य नहीं है। माता-पिता भी गुण मिलान से आगे की नहीं सोचते। गुण मिलान ठीक है तो तुरन्त सम्बन्ध तय कर देते हैं। मेरा विचार है कि गुण-दोषों के बारे में जानकारी प्राप्त होना उचित है लेकिन इसके साथ-साथ ग्रह मिलान तथा भाव मिलान भी आवश्यक है जिसे अधिकांश ज्योतिषी इसके बारे में जातक को कुछ नहीं बताते हैं। जातक की दिलचस्पी भी गुण मिलान में ही अधिक दिखाई देती है। कन्या के माता-पिता का यही प्रयास रहता है कि जितना जल्दी सम्भव हो उतनी ही जल्दी कन्या के हाथ पीले कर दिये जायें। इसलिये वे ग्रह मिलान तथा भाव मिलान के बारे में रुचि नहीं दिखाते और न उन्हें इसकी प्राथमिक जानकारी ही होती है। संक्षिप्त में यहां पर इसके बारे में आवश्यक विवेचना की जा रही है:- संतान भावः वैवाहिक जीवन का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व संतान प्राप्ति का होता है क्योंकि संतान द्वारा ही वंश आगे तक चलता है। कुण्डली द्वारा इस बारे में जानकारी प्राप्त होती है कि भावी दम्पती को संतान सुख कब होगा अथवा नहीं होगा ? कुण्डली का पांचवां भाव संतान भाव माना गया है। इसमें यदि स्त्री अथवा पुरुष दोनों अथवा दोनों में से कोई एक संतानोत्पत्ति में असमर्थ है अर्थात् उनके संतान सुख नहीं है तो ऐसे विवाह को उचित नहीं माना गया है। इसके विपरीत यदि पुरुष का पंचम भाव किसी अन्य ग्रह से पीड़ित है किन्तु स्त्री के सन्तान सुख में कोई में कोई बाधा नहीं है तो ऐसी स्थिति में कुछ विशेष उपाय करने के पश्चात् विवाह सम्पन्न किया जा सकता है। कन्या के माता-पिता को विशेष रूप से कुण्डली का विवेचन करते समय संतान पक्ष के बारे में अवश्य जानकारी लेनी चाहिये। धन भावः- जीवन के समस्त पक्षों में धन के अधिक महत्त्व को स्पष्टतः स्वीकार किया गया है। विवाह से पूर्व कुण्डली की विवेचना करते समय धन भाव के बारे में जानकारी प्राप्त कर लेना उचित होगा। यदि स्त्री एवं पुरुष दोनों के धन भाव में धनयोग नहीं है तो ऐसे विवाह को टालना उचित रहता है। यदि स्त्री के धनयोग नहीं है किन्तु पुरुष की कुण्डली में धनयोग उपस्थित है तो ऐसे विवाह को स्वीकार किया गया है क्योंकि विवाह के पश्चात् स्त्री का जीवन पुरुष के साथ ही व्यतीत होता है। इसलिये यदि पुरुष की कुण्डली में धन योग है तो उस धन का उपयोग एवं उसका लाभ पत्नी को स्वतः ही प्राप्त हो जायेगा। सुख भावः- सुख भाव द्वारा दाम्पत्य जीवन में समस्त सुखों के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती है। इसमें भी यदि पुरुष की कुण्डली में सम्पूर्ण सुख की उपस्थिति है तो ऐसे विवाह को उचित माना गया है। यदि दोनों के भाव में सुख प्राप्ति नहीं है तो ऐसे विवाह को भी टालना उचित है। दाम्पत्य सुखः- दाम्पत्य सुख का महत्त्व पति-पत्नी दोनों के लिये समान रूप से आवश्यक समझा गया है। विद्वान ज्योतिषियों द्वारा जातक की कुण्डली से यह निश्चित किया जा सकता है कि उनके जीवन में दाम्पत्य सुख है अथवा नहीं। दाम्पत्य सुख से तात्पर्य दो प्रकार से किया जा सकता है। विवाह के पश्चात् यदि पति अथवा पत्नी दोनों में से कोई भी अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है तो इसे दाम्पत्य सुख में अवरोध के रूप में देखा जा सकता है। #KundliMilan #HoroscopeMatching #VedicAstrology #Vivah #MarriageCompatibility #GunaMilan #AstrologyTips #HinduWedding #MangalDosha #Matchmaking #IndianWedding #Jyotish #AstroAdvice #RelationshipGoals #Shaadi