У нас вы можете посмотреть бесплатно राजस्थान, राजनीति और माली समाज Rajasthan, Rajneeti aur Mali Samaj или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
Если кнопки скачивания не
загрузились
НАЖМИТЕ ЗДЕСЬ или обновите страницу
Если возникают проблемы со скачиванием видео, пожалуйста напишите в поддержку по адресу внизу
страницы.
Спасибо за использование сервиса ClipSaver.ru
आखिर ऐसा क्या जादू है कि माली जाति का एकमात्र विधायक मुख्यमंत्री बन जाता है? कैसे एक माली ताकतवर पार्टी का प्रदेशाध्यक्ष बन जाता है? आखिर क्या है माली जाति की राजनीतिक दमदारी? या राजस्थान में माली क्यों हैं- हर पार्टी की मजबूरी? आज हम माली जाति की इसी राजनीतिक रखवाली पर चर्चा करेंगे। और सबसे अंत में बात माली समुदाय के बारे में एक दिलचस्प तथ्य की धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय। कबीर के इस लिखे को माली समुदाय ने राजस्थान की राजनीति में गम्भीरता से लिया और कांग्रेस से 3 बार मुख्यमंत्री बने, भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष बने, कई राज्य सरकारों में मंत्री बने, राज्यसभा तक पहुंचे। माली समुदाय के राजनीतिक ताकत बनने में कई उतार-चढ़ाव आए... पहला चढ़ाव आया - साल 1998, राजस्थान विधानसभा के चुनाव परिणाम आ चुके हैं, मुख्यमंत्री को लेकर गहमागहमी है, कई दिग्गज कतार में हैं, सबके अपने दांव हैं, सबके अपने पेंच, मगर तभी नाम को लेकर घोषणा होती है और माली समुदाय से आने वाले अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री चुन लिया जाता है- उम्र है मात्र 47 साल और विधायक भी नहीं हैं साल 2008, चुनाव परिणाम आते हैं, लेकिन इस बार कांग्रेस के सभी दिग्गज चुनाव हार चुके हैं...सिवाय एक को छोड़कर और मुख्यमंत्री के लिए रस्साकस्सी के बीच फिर उन्हें चुन लिया जाता है। फिर आया साल 2018...चुनाव परिणामों में कांग्रेस की जीत और इस बार बगीचे के इस माली की राह कठिन...दिल्ली से एक तस्वीर जारी होती है और बगीचे की रखवाली का जिम्मा एक बार फिर एकमात्र माली विधायक अशोक गहलोत को। और जब 2018 में अशोक गहलोत मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे, तो उस समय विपक्षी भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष थे- एक और माली मदनलाल सैनी,जो राजयसभा के सदस्य भी रहे। माली समुदाय से भाजपा में प्रभुलाल सैनी काफी कद्दावर नेता हैं, जिन्होंने वसुंधरा राजे की सरकार में कृषि जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाला। माली समुदाय की राजनीतिक ताकत को जानने के लिए कुछ आंकड़े जान लेना जरूरी है- 1931 की जनगणना बताती है कि राजस्थान में माली समुदाय की संख्या लगभग 3.25% है, हालांकि अभी माली समुदाय खुद के लिए 10% क्लेम करता है। इतनी कम आबादी के बावजूद राजस्थान की राजनीतिक ताकत बनने की भी एक कहानी है। आपने वो गट्ठर वाली कहानी सुनी होगी, जिसमें सारी लकड़ियां एक साथ करने पर वो टूटता नहीं है, बिखरा हुआ टूट जाता है और इस तरह एकता में ताकत का संदेश दिया जाता है। मगर राजस्थान में माली समुदाय की कहानी उल्टी है और इसकी मजबूती भी। माली समुदाय का बिखरा हुआ होना ही इसकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत रहा है। राजस्थान की 200 विधानसभाओं में माली समुदाय लगभग हर विधानसभा में 5000 से लेकर 50,000 तक की संख्या में मौजूद है और हार-जीत का अंतर पैदा करता है। अगर भौगोलिक दृष्टि से देखें तो माली समुदाय पूर्वी राजस्थान में सबसे मजबूत स्थिति में है, वहीं शेखावाटी, हाड़ौती, जयपुर शहर और पश्चिमी राजस्थान में कुछ इलाकों में बेहद प्रभावशाली स्थिति में है, तो मेवाड़ के कुछ इलाके को छोड़कर पूरे दक्षिणी राजस्थान और हनुमानगढ़-गंगानगर वाले इलाके में माली समुदाय बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाता है। इन आंकड़ों से आप इतना तो समझ गए होंगे कि हर इलाके में बिखरा हुआ माली समाज अपने लिए खुद को राजनीतिक ताकत कैसे बना पाया। माली समुदाय की इस राजनीतिक ताकत को भांपते हुए ही 2018 के विधानसभा चुनाव में दोनों ही राजनीतिक दलों ने 12 टिकट इस समाज के नाम किए। अब बात उस दिलचस्प तथ्य की, जिसका वादा हमने आपसे किया था। 4 जून 2023...जयपुर में माली महासंगम का मंच और पोडियम पर भाषण दे रहे थे यूपी के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और इस बीच उनको भाषण बीच में रोककर पोडियम छोड़ना पड़ा। महासंगम में मौजूद लोगों ने हमें बताया कि वो केशव प्रसाद मौर्य द्वारा महासंगम के मंच को भाजपा का रूप देने से नाराज थे। इसके उलट जब हमने माली समुदाय के राजनीतिक इतिहास और वोटिंग पैटर्न के बारे में जानकारी इकट्ठा की, तो एक दिलचस्प तथ्य हमारे सामने आया। माली समुदाय को राजस्थान में भाजपा का कोर वोटर माना जाता रहा है। मगर, समाज के कुछ बुजुर्गों और खासकर नौकरीपेशा युवाओं से बात करने पर ये निष्कर्ष निकलकर सामने आया कि इस बार राजस्थान का माली समुदाय संघ-भाजपा की छत्रछाया से दूर पंजे की तरफ अपने कदम बढ़ा रहा है और यही कारण है कि केशव प्रसाद मौर्य को महासंगम में माली समाज के युवाओं के विरोध का सामना करना पड़ा। कांग्रेस की ओर बढ़ते रुझान के पीछे माली समाज तीन वर्षों की तरफ इशारा करता है- 1998, 2008 और 2018। Plz join us on : / @rajgatha1 / rajgatha1 / rajgatha1