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भेषज्य रत्नावली आयुर्वेदिक एक महान पुस्तक है इस पुस्तक में 106 अध्याय हैं जिसके अंतर्गत सारी आयुर्वेदिक मेडिसिंस बनाने की पूरी विधिया बताई गई हैं और आयुर्वेद मेडिसिन उनको किस रोग में देना चाहिए यही बताया गया है यह ग्रन्थ १८ वीं शताब्दी में कविराज स्व. श्री गोविन्ददास सेन द्वारा संकलित किया गया था, किन्तु उनके जीवन काल में इस ग्रन्थ का प्रकाशन नहीं हो सका था। उनकी मृत्यु के बाद उनके कोई सम्बन्धी या 'दौहित्र' कविराज श्री विनोदलाल सेन द्वारा यह संस्कृत टिप्पणी के साथ प्रकाशित हुआ था, जिसका द्वितीय एवं तृतीय परिवर्धित-संशोधित संस्करण कविराज श्री आशुतोष सेन गुप्त के सम्पादकत्व में हुआ था, जिसमें २६०० योगों का समावेश किया गया था। उक्त संस्करण पुरानी लाइब्रेरिओं में देखा जाता है। भैषज्यरत्नावली की अनेक व्याख्या समय-समय पर की गई है, जिसमें समय-समय पर उनके योगों में भी परिवर्धन किये गये । लखनऊ से श्री नवलकिशोर प्रेस द्वारा भी १९वीं शताब्दी में इसका परिवर्धित संस्करण निकला, जिसमें ३००० योगों का समावेश हुआ था। २०वीं शताब्दी में कविराज जयदेव विद्यालंकार द्वारा वि.सं. १९८२ में मोतीलाल बनारसीदास द्वारा लाहौर से उसका परिवर्धित संस्करण निकला, जिसमें ३३०० योगों को प्रविष्टी मिली थी। किन्तु १९५१ ई. में कविराज पं. अम्बिकादत्त शास्त्री द्वारा अनुवादित कर चौखम्भा वाराणसी द्वारा प्रकाशित हुआ, जिसमें ४५०० योगों को तथा परिशिष्ट में २०० योगों को समाविष्ट किया गया। आज बाजार में दो ही - १. जयदेव विद्यालंकार और २. पं. अम्बिकादत्त शास्त्री द्वारा अनुदित व्याख्या वाली ही भैषज्यरत्नावली प्राप्त है । मेरे द्वारा व्याख्यायित प्रस्तुत भैषज्यरत्नावली के लेखन का प्रारम्भ चौखम्बा सुरभारती के श्री नवनीत दास गुप्त के आग्रह के स्वरूप १९९० ई. में कर दिया था। किन्तु ग्रन्थ बड़ा है और मेरी लेखनी भी अनेक ग्रन्थों की व्याख्या में व्यस्त रहने के कारण इसका कार्य धीरे-धीरे हुआ। साथ ही सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से १९९१ में सेवा निवृत्ति के बाद Contract पर आयुर्वेद विश्वविद्यालय जामनगर में फार्मेसी निदेशक रूप में २००० तक कार्य करता रहा। पुनः २००० के उत्तरार्द्ध में S.D.M. College of Ayurveda Udupi में पुन: Contract रूप में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष तथा General Manager of Pharmary रूप में ज्वाइन कर व्यस्त हो गया, जिससे ग्रन्थ प्रकाशन में विलम्ब हुआ । मैंने कविराज पं. अम्बिकादत्त शास्त्री द्वारा सम्पादित भैषज्यरत्नावली के पाठों को आधार मान कर इस ग्रन्थ की व्याख्या की है किन्तु उनके परिशिष्ट को स्वीकार नहीं किया है। फिर भी मैंने ६-८ प्रमुख योगों को इसमें समाविष्ट किया है; यथा— आरोग्यवर्धनी, त्रिभुवनकीर्ति, कुमार्यासवादि आदि जिससे विद्वान् वैद्यों को इन योगों को ढूँढने में अन्य ग्रन्थों का सहयोग नहीं लेना पड़े । प्रकृत भैषज्यरत्नावली की व्याख्या की कुछ विशेषताऐं हैं। यथा— मैंने इनके प्रायः अधिकांश योगों को मूल ग्रन्थों से मिलाकर ढूँढ निकाला है जिससे उसकी प्रमाणिकता प्रतीत होती है। जैसे सितोपलादि चूर्ण मूलतः चरकसंहिता का है, वैसे ही अन्य योगों को भी ढूँढने का भरसक प्रयास किया है; तथापि कुछ ऐसे योग नहीं मिल पाये हैं जिससे उनके मूलस्रोत का ज्ञान नहीं हो पाया है। मेरी इस व्याख्या में औषध निर्माण हेतु सरल हिन्दी भाषा का प्रयोग किया गया है। इस व्याख्या से अब यह पता चल पायेगा कि औषध का वर्ण कैसा है, स्वाद कैसा है, गन्ध कैसा है, आधुनिक मात्रा कितनी देनी है, अनुपान क्या होना चाहिए तथा इस औषधि को किन प्रमुख रोगों में देना चाहिए। इसके अतिरिक्त निर्माण में पुरानी मात्रा कर्ष, पल, प्रस्थ, आढक, द्रोण आदि को सर्वत्र आधुनिक मात्रा (मि.ग्रा., किलो., मि.ली., लीटर आदि) में परिवर्त्तित किया गया है जिससे औषधि निर्माताओं को पुराने मानों से होने वाली परेशानी से बचाया जा सके ।https://www.google.com/search?q=bhais... My Others Social Link Other You tube channel / vishalayurvedamratanaam / vishalepics Instagram-: / cozi3lcnu4x https://www.instagram.com/ Facebook-: https://www.facebook.com/Vishal-Epics... / vnshivhare Tweeter-: https://twitter.com/home?lang=en Thanks for watching #vishalayurvedamratanaam #ayurved #bheshjyaratnavali #bookreview #bha