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1. कहानी की पृष्ठभूमि: कहानी की शुरुआत लेखक के एक बाज़ार के दृश्य से होती है, जहाँ वह एक बुढ़िया को फुटपाथ पर खरबूजे बेचते हुए देखता है। वह बुढ़िया सिर झुकाकर बुरी तरह रो रही थी, लेकिन आस-पास के लोग उसकी मदद करने के बजाय उस पर तंज कस रहे थे और उसकी आलोचना कर रहे थे। 2. बुढ़िया के दुख का कारण: लेखक को पता चलता है कि बुढ़िया का 23 वर्षीय जवान बेटा 'भगवाना' एक दिन पहले ही सांप के काटने से मर गया है। घर में पोते-पोती भूख से बिलख रहे थे और बहू को तेज़ बुखार था। घर में जो कुछ भी थोड़ा-बहुत धन था, वह बेटे के कफ़न और अंतिम संस्कार में खर्च हो गया था। मजबूरी में, अपने परिवार का पेट पालने के लिए उसे अगले ही दिन बाज़ार में खरबूजे बेचने आना पड़ा। 3. समाज की असंवेदनशीलता: समाज के लोग बुढ़िया की गरीबी और मजबूरी को समझने के बजाय उस पर कटाक्ष कर रहे थे। लोग कह रहे थे कि "कैसी औरत है, जवान बेटा मर गया और यह दुकान सजाकर बैठी है।" लोग उसे 'सूतक' (अशुद्धि का समय) के नियमों का उल्लंघन करने वाली मान रहे थे, जिससे दूसरों का धर्म भ्रष्ट हो सकता था। 4. अमीर बनाम गरीब का दुख: लेखक इस घटना की तुलना अपने पड़ोस की एक अमीर महिला से करता है, जिसके बेटे की मृत्यु भी कुछ समय पहले हुई थी। वह महिला ढाई महीने तक बिस्तर से नहीं उठी थी और शहर के लोग उसके प्रति सहानुभूति रख रहे थे। 5. कहानी का निष्कर्ष: लेखक अंत में यह निष्कर्ष निकालता है कि दुख मनाने का अधिकार भी इंसान की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। एक अमीर व्यक्ति के पास दुख मनाने का समय और साधन होते हैं, जबकि एक गरीब व्यक्ति को अपनी और अपने परिवार की भूख मिटाने के लिए अपने दुख को दबाकर काम पर निकलना पड़ता है। गरीबी उससे दुख प्रकट करने का अधिकार भी छीन लेती है। यह कहानी समाज की संवेदनहीनता और वर्ग-भेद को बहुत ही मार्मिक ढंग से उजागर करती है।