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बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥ वीरांगना लक्ष्मी बाई झांसी की रानी और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की वीरांगना थीं। उन्होंने महज 23 साल की उम्र में ही अंग्रेज़ साम्राज्य की सेना से संग्राम किया और रणक्षेत्र में वीरगति प्राप्त की, लेकिन जीते जी अंग्रेजों को झांसी पर कब्जा नहीं करने दिया। रानी लक्ष्मीबाई अकेले होने के कारण अपनी झांसी नहीं बचा पाईं लेकिन देश को बचाने की बुनियाद खड़ी कर गईं। निडरता का पाठ पढ़ा गईं, अमरत्व की राह दिखा गईं। झांसी की रानी का किला आज भी उत्तर प्रदेश के बुदेलखंड में उनकी वीरता की याद दिलाता है। सुभद्रा कुमारी चौहान की उनके जीवन पर लिखी कविता से अच्छी शौर्य गाथा इस वीरांगना की हो ही नहीं सकती। उनकी कविता की ये अंतिम पंक्तियां रानी लक्ष्मीबाई बाई के बलिदान को सच्ची श्रद्धांजलि हैं- जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी, यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी, होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी, हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी। तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। Producer– Shams Tabrej/Ritu Kumar Production- Ekta Mishra/Vibhore Video Editor- Jaspal/ Anil