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श्रीकृष्ण का अंत और उसका जगन्नाथ धाम से रहस्यमय संबंध हिंदू धर्मग्रंथों में श्रीकृष्ण को केवल एक ऐतिहासिक पुरुष नहीं, बल्कि पूर्ण ब्रह्म, योगेश्वर और कालातीत चेतना के रूप में स्वीकार किया गया है। ऐसे में उनका तथाकथित “अंत” भी साधारण नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक रहस्य से जुड़ा हुआ है। यह रहस्य प्रत्यक्ष रूप से जगन्नाथ धाम, पुरी से संबंधित माना जाता है। महाभारत युद्ध के पश्चात जब यदुवंश का विनाश हुआ, तब श्रीकृष्ण ने अपने अवतार-कार्य की पूर्णता के पश्चात पृथ्वी से लीला-संहार का संकेत दिया। वन में ध्यानावस्था के दौरान जरा नामक शिकारी के बाण से उनका स्थूल शरीर शांत हुआ। किंतु शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि श्रीकृष्ण का शरीर नष्ट नहीं हुआ, क्योंकि वह पंचतत्वों से बना ही नहीं था। पुराणों के अनुसार, श्रीकृष्ण का दिव्य हृदय (ब्रह्म तत्व) अग्नि में भी भस्म नहीं हुआ। वही अमर तत्व कालांतर में समुद्र की लहरों के माध्यम से नीलाचल क्षेत्र (वर्तमान पुरी) पहुँचा। यही दिव्य तत्व आगे चलकर “दारु ब्रह्म” कहलाया। राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्नादेश द्वारा इस दारु ब्रह्म की प्राप्ति का निर्देश मिला। भगवान विश्वकर्मा ने साधु के वेश में प्रकट होकर उसी दिव्य काष्ठ से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों का निर्माण आरंभ किया। किंतु नियत समय से पूर्व द्वार खुल जाने के कारण मूर्तियाँ अधूरी रह गईं—जो यह संकेत देती हैं कि ईश्वर पूर्ण होकर भी अपूर्ण रूप में भक्तों के बीच निवास करता है। जगन्नाथ मंदिर में आज भी “ब्रह्म परिवर्तन” की गुप्त परंपरा निभाई जाती है, जहाँ श्रीकृष्ण के उसी अमर ब्रह्म तत्व को एक देह से दूसरी देह में स्थानांतरित किया जाता है। यह परंपरा इस बात का प्रमाण मानी जाती है कि श्रीकृष्ण का अंत नहीं हुआ, बल्कि वे जगन्नाथ के रूप में आज भी जीवित हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि द्वारका में श्रीकृष्ण की लीला का विराम हुआ, परंतु पुरी में उनकी चेतना आज भी अनंत काल तक विराजमान है।