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#garbhsanskar #youtube #budha #updesh #new #trending #video गौतम बुद्ध के उपदेशों और बौद्ध परंपराओं में 'गर्भ संस्कार' का अर्थ वह आध्यात्मिक और मानसिक तैयारी है, जो एक संतान के जन्म से पहले माता-पिता (विशेषकर माता) को करनी चाहिए। बौद्ध धर्म के अनुसार, एक जागरूक और करुणामयी संतान के लिए गर्भ के समय का वातावरण अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यहाँ बुद्ध के दर्शन पर आधारित गर्भ संस्कार के मुख्य बिंदु दिए गए हैं: 1. माता का मानसिक संतुलन (चित्त की शुद्धि) बुद्ध ने सिखाया कि हमारे विचार हमारे अस्तित्व को गढ़ते हैं। गर्भ संस्कार के दौरान माता को 'सती' (Mindfulness) का अभ्यास करना चाहिए। • सकारात्मक विचार: क्रोध, ईर्ष्या और भय से दूर रहकर मैत्री (Loving-kindness) का भाव रखना। • शांति: माता का मन जितना शांत होगा, गर्भ में पल रहे शिशु का स्वभाव उतना ही गंभीर और स्थिर होगा। 2. मैत्री भावना और ध्यान (Metta Meditation) बौद्ध परंपरा में गर्भवती स्त्री को 'मैत्री भावना' का अभ्यास करने की सलाह दी जाती है। • माता को हर दिन यह संकल्प करना चाहिए: "मेरा बच्चा सुखी हो, सुरक्षित हो और सभी दुखों से मुक्त हो।" * यह सकारात्मक ऊर्जा शिशु के मानसिक विकास में बीज का काम करती है। 3. सात्विक आहार और विहार बुद्ध ने 'मध्यम मार्ग' पर जोर दिया है। गर्भ संस्कार के अंतर्गत: • आहार: शुद्ध, ताजा और सात्विक भोजन ग्रहण करना। • विहार (आचरण): हिंसा और कठोर वचनों से बचना। माता को ऐसी कथाएँ सुननी चाहिए जो करुणा और प्रज्ञा (बुद्धि) को बढ़ाती हों। 4. अंगुलिमाल सुत्त (Angulimala Paritta) का पाठ बौद्ध देशों (जैसे श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार) में गर्भ संस्कार के रूप में 'अंगुलिमाल सुत्त' का पाठ करना सबसे पवित्र माना जाता है। • मान्यता है कि इस सुत्त के प्रभाव से प्रसव (Delivery) आसान होता है और बच्चा स्वस्थ पैदा होता है। • इसमें भगवान बुद्ध द्वारा दी गई सत्य की शक्ति का आह्वान किया जाता है। 5. माता-पिता का नैतिक आचरण (शील) बुद्ध के अनुसार, बच्चा केवल शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि अपने साथ पुराने कर्मों के संस्कार भी लेकर आता है। माता-पिता को 'पंचशील' का पालन करना चाहिए: 1. अहिंसा (किसी को चोट न पहुँचाना) 2. अस्तेय (चोरी न करना) 3. ब्रह्मचर्य (संयम) 4. सत्य बोलना 5. नशामुक्त जीवन संक्षिप्त निष्कर्ष बौद्ध गर्भ संस्कार का मूल उद्देश्य 'एक प्रबुद्ध जीव' को जन्म देना है। यह केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि माता के भीतर करुणा, प्रज्ञा और शांति विकसित करने की एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। "जैसा बीज होगा, वैसा ही फल होगा। यदि गर्भ के दौरान मैत्री का बीज बोया जाए, तो संतान बुद्धत्व की राह पर चलने वाली होती है।" अंगुलिमाल सुत्त की कथा यह सुत्त उस समय का है जब अंगुलिमाल (जो पहले एक डाकू था) बुद्ध का शिष्य बन गया था। एक बार उसने एक महिला को प्रसव पीड़ा (Labor pain) में बहुत तड़पते हुए देखा। वह व्याकुल होकर बुद्ध के पास गया। बुद्ध ने उसे निर्देश दिया कि वह उस महिला के पास जाकर यह 'सत्य वचन' कहे। विशेष मंत्र (पालि भाषा में) बौद्ध भिक्षु अक्सर गर्भवती महिलाओं के आशीर्वाद के लिए इन पंक्तियों का पाठ करते हैं: "यतोहं भगिनि अरियाय जातिया जातो, नाभिजानामि संचिच्च पाणं जीविता वोरोपेता। तेन सच्चेन सोत्थि ते होतु सोत्थि गब्भस्स।" इसका हिंदी अर्थ: "हे बहन! जब से मैंने 'आर्य जन्म' (अरिहंत या धम्म का मार्ग) लिया है, मुझे याद नहीं आता कि मैंने जानबूझकर किसी भी प्राणी की हत्या की हो। इस सत्य के प्रभाव से, तुम्हारा कल्याण हो और तुम्हारे गर्भस्थ शिशु का कल्याण हो।" इसका अभ्यास कैसे करें? यदि आप या आपके परिवार में कोई इस संस्कार का पालन करना चाहता है, तो इसके लाभ के लिए निम्नलिखित तरीके अपनाए जा सकते हैं: • श्रवण (सुनना): सुबह और शाम शांत मन से इस सुत्त का पाठ सुनना मानसिक तनाव को कम करता है। • सत्य का संकल्प: बुद्ध ने सिखाया कि 'सत्य की शक्ति' (Sacca-kiriya) सबसे बड़ी सुरक्षा है। माता को अपने जीवन में ईमानदारी और करुणा का संकल्प लेना चाहिए। • जल अभिमंत्रित करना: कई बौद्ध परंपराओं में इस सुत्त का पाठ करते हुए पानी के पात्र को स्पर्श किया जाता है और फिर वह 'परित्त जल' माता को पिलाया जाता है। माना जाता है कि इससे प्रसव के समय होने वाली जटिलताएँ कम होती हैं। मनोवैज्ञानिक लाभ वैज्ञानिक दृष्टि से भी, जब माता इस तरह के शांत और कल्याणकारी मंत्र सुनती है, तो शरीर में एंडोर्फिन जैसे 'फील-गुड' हार्मोन निकलते हैं। इससे माँ का रक्तचाप नियंत्रित रहता है और शिशु तक ऑक्सीजन का प्रवाह बेहतर होता है।