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म्हारा दादाजी के जी मांडी गणगौर II गणगौर गीत 2026 “म्हारा दादाजी के जी मांडी गणगौर” एक ऐसा शीर्षक है जिसमें सिर्फ एक लोक उत्सव नहीं, बल्कि पूरा राजस्थानी संस्कार, परिवार की परंपरा, और पीढ़ियों से चली आ रही श्रद्धा की मिठास समाई हुई है। यह गीत श्रोता को सीधे उस आंगन में ले जाता है जहाँ दादाजी की छत्रछाया, घर की बहुओं-बेटियों की हंसी, ढोलक की थाप, और गौरा माता की पूजा एक साथ जीवंत हो उठती है। यह केवल नाच-गान का प्रसंग नहीं, बल्कि घर की इज्जत, कुल की मर्यादा, और सुहाग की मंगल कामना का सामूहिक उत्सव है। गणगौर राजस्थान की आत्मा है। जैसे ही फाल्गुन-चैत्र की हवा में केसरिया रंग घुलता है, गांव-गांव, ढाणी-ढाणी में स्त्रियाँ गौरा-ईसर की प्रतिमा को सजा कर पूजा करती हैं। इस गीत में “दादाजी” का उल्लेख परिवार के मुखिया के रूप में है — वो जिनके आशीर्वाद से यह उत्सव घर के आंगन में सजा है। उनकी “मांडी” यानी हवेली या चौक में गणगौर का बैठना, पूरे कुल के लिए गर्व की बात है। गीत की कल्पना एक भव्य राजपूती हवेली से शुरू होती है। ऊँचे झरोखे, रंगोली से सजा आंगन, दीयों की कतार, और बीच में सुशोभित गणगौर माता। बहुएँ लहरिया और बंधेज के घाघरा-चोली में सजी हैं, माथे पर बोरला, हाथों में मेहंदी, पांव में पायल की मधुर झंकार। जैसे ही ढोलक की थाप पड़ती है, गीत की पहली पंक्ति वातावरण में गूंजती है — म्हारा दादाजी के जी मांडी गणगौर… यह पंक्ति गर्व से भरी है। इसमें अपनापन है, मान है, और उत्सव का ऐलान है। मानो पूरा गांव सुन ले कि इस घर में आज गौरा माता पधारी हैं। गीत आगे बढ़ता है तो उसमें स्त्रियों की उमंग दिखाई देती है। वे सहेलियों को बुलाती हैं — आओ, घूमर घालो, माता का गुणगान करो। छोटी बच्चियाँ अपनी माताओं की नकल करती हुईं, रंगीन चुनरियाँ लहराती हैं। बड़ी बुजुर्ग महिलाएँ मुस्कुराती हैं, क्योंकि वे जानती हैं कि यही परंपरा आगे बढ़ रही है। इस गीत की खासियत है कि इसमें भक्ति और उत्सव दोनों साथ चलते हैं। कहीं सुहाग की कामना है, कहीं पति की लंबी उम्र की प्रार्थना, तो कहीं परिवार की खुशहाली का आशीर्वाद। हर अंतरे में भावना बदलती है, लेकिन केंद्र में गौरा माता ही रहती हैं। दादाजी की उपस्थिति इस गीत को और गहरा बना देती है। वे आंगन के एक कोने में बैठे, इस आनंद को निहार रहे हैं। उनकी आँखों में संतोष है कि उनके पूर्वजों की रीति आज भी उतनी ही श्रद्धा से निभाई जा रही है। गीत मानो उनके सम्मान में भी है — क्योंकि उनकी वजह से यह मांडी, यह परंपरा, यह उत्सव कायम है। गीत में रंगों की बरसात है — केसरिया, गुलाबी, हरा। फूलों की महक है, कंगनों की खनक है, और लोक स्वर की मिठास है। जब महिलाएँ एक साथ ताली बजाती हैं तो लगता है जैसे पूरा वातावरण धड़क रहा हो। एक भावुक मोड़ तब आता है जब नवविवाहित बहू गौरा माता से अपने दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि मांगती है। उसकी आँखों में लाज है, दिल में विश्वास है। गीत इस क्षण को बहुत कोमलता से पकड़ता है। फिर उत्सव का रूप और खुलता है। सहेलियाँ हंसी-मजाक करती हैं, एक-दूसरे को छेड़ती हैं, और नाच की गति तेज हो जाती है। पायल की रुनझुन, ढोल की थाप, और सामूहिक स्वर — सब मिलकर ऐसा दृश्य बनाते हैं जिसे सुनने वाला भी खुद को उसी आंगन में महसूस करता है। “घड़ी दोय खेलवाने जावादो” जैसी भावना गीत में विनती का रूप लेती है — जैसे कोई गौरा माता से कह रहा हो कि अभी मत जाओ, थोड़ी देर और हमारे बीच रहो। यह प्रेम है, यह लगाव है, और यह भक्त का अपनी देवी से आत्मीय संवाद है। गीत का अंतिम भाग आशीर्वाद से भरा होता है। गौरा माता से प्रार्थना की जाती है कि दादाजी का घर यूँ ही बसा रहे, बहुओं का सुहाग अटल रहे, बच्चों की किलकारियाँ गूंजती रहें, और हर साल इसी तरह मांडी में गणगौर विराजें। यह गीत सिर्फ सुनने के लिए नहीं, महसूस करने के लिए है। इसमें राजस्थान की मिट्टी की खुशबू है, परिवार की गर्माहट है, और भक्ति की गहराई है। जब इसे मंच पर या किसी वीडियो में प्रस्तुत किया जाएगा, तो दर्शक न केवल संगीत का आनंद लेंगे बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने का अनुभव भी करेंगे। “म्हारा दादाजी के जी मांडी गणगौर” दरअसल उस रिश्ते का गीत है जो देवी, परिवार और परंपरा को एक सूत्र में पिरो देता है। यह हमें याद दिलाता है कि आधुनिक समय में भी हमारी असली पहचान हमारे संस्कार और हमारे उत्सव ही हैं। अगर इस गीत को ढोलक, हारमोनियम और पारंपरिक लोक वाद्यों के साथ गाया जाए, तो इसकी मिठास और भी बढ़ जाती है। सामूहिक कोरस इसे और भव्य बना देता है, जैसे पूरा गांव एक साथ माता का स्वागत कर रहा हो। अंत में, यह गीत श्रद्धा, प्रेम, सम्मान और उत्सव का संगम है। दादाजी की मांडी में बैठी गणगौर केवल देवी नहीं, बल्कि घर की बेटी, बहू, और कुल की रक्षक बन जाती हैं। यही इस गीत की आत्मा है — अपनापन, आस्था, और आनंद।