У нас вы можете посмотреть бесплатно 9 फरवरी 2026 || श्री राम कथा || आज की कथा || मर्यादा, भक्ति और धर्म की अमर गाथा श्री पूज्य राजन जी или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
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श्री राम कथा – मर्यादा, भक्ति और धर्म की अमर गाथा श्री राम कथा केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, जीवन-दर्शन और नैतिक मूल्यों की शाश्वत धरोहर है। यह कथा मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष—कर्तव्य, प्रेम, त्याग, सत्य, करुणा और धर्म—को अत्यंत सरल और प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करती है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का जीवन हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म का मार्ग कैसे अपनाया जाए। रामायण की यह दिव्य कथा त्रेतायुग से लेकर आज के आधुनिक युग तक उतनी ही प्रासंगिक है जितनी अपने समय में थी। अयोध्या और राजा दशरथ अयोध्या नगरी, सरयू नदी के तट पर बसी, धर्म और समृद्धि की प्रतीक थी। यहाँ के राजा दशरथ धर्मात्मा, पराक्रमी और प्रजावत्सल थे। उनके तीन रानियाँ—कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा—थीं। वर्षों तक संतान न होने से राजा दशरथ अत्यंत दुखी रहते थे। ऋष्यश्रृंग मुनि के परामर्श से पुत्रेष्टि यज्ञ कराया गया, जिसके फलस्वरूप उन्हें चार दिव्य पुत्रों की प्राप्ति हुई—माता कौशल्या से श्री राम, माता कैकेयी से भरत, तथा माता सुमित्रा से लक्ष्मण और शत्रुघ्न। श्री राम बाल्यकाल से ही शील, सौम्यता और पराक्रम के प्रतीक थे। गुरु वशिष्ठ के आश्रम में शिक्षा प्राप्त करते हुए उन्होंने वेद, शास्त्र, नीति और धनुर्विद्या में अद्भुत निपुणता हासिल की। लक्ष्मण सदा उनके साथ छाया की भाँति रहते थे। विश्वामित्र यज्ञ और ताड़का वध एक दिन महर्षि विश्वामित्र राजा दशरथ के दरबार में पधारे और अपने यज्ञ की रक्षा हेतु श्री राम और लक्ष्मण को साथ ले जाने का आग्रह किया। माता कौशल्या और राजा दशरथ के मन में भय था, किंतु धर्म की मर्यादा के कारण उन्होंने अनुमति दी। विश्वामित्र के साथ जाकर श्री राम ने ताड़का वध किया, सुबाहु और मारीच जैसे राक्षसों का संहार किया तथा यज्ञ की रक्षा की। यह प्रसंग दर्शाता है कि अधर्म के विनाश के लिए धर्म की शक्ति का प्रयोग आवश्यक है। सीता स्वयंवर और विवाह विश्वामित्र मुनि श्री राम को मिथिला ले गए, जहाँ राजा जनक की पुत्री माता सीता का स्वयंवर आयोजित था। शर्त थी—जो शिव धनुष को उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, वही सीता का पति बनेगा। अनेक राजाओं के असफल प्रयासों के बाद श्री राम ने सहजता से शिव धनुष उठाकर तोड़ दिया। समस्त सभा जयघोष से गूंज उठी। श्री राम और माता सीता का विवाह हुआ, साथ ही लक्ष्मण-उर्मिला, भरत-मांडवी और शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति के विवाह संपन्न हुए। यह विवाह धर्म, प्रेम और समानता का प्रतीक था। राज्याभिषेक की तैयारी और वनवास अयोध्या लौटने पर राजा दशरथ ने श्री राम का युवराज अभिषेक करने का निर्णय लिया। संपूर्ण अयोध्या उत्सव में डूबी थी। किंतु मंथरा के कुटिल परामर्श से प्रेरित होकर माता कैकेयी ने अपने दो वरदान माँगे—भरत का राज्याभिषेक और श्री राम का चौदह वर्षों का वनवास। वचनबद्ध राजा दशरथ विवश हो गए। श्री राम ने बिना किसी विरोध के पिता की आज्ञा स्वीकार की। माता सीता और लक्ष्मण भी उनके साथ वन जाने का संकल्प लेते हैं। यह प्रसंग त्याग, आज्ञापालन और कर्तव्यपरायणता की सर्वोच्च मिसाल है। अयोध्या शोक में डूब जाती है और राजा दशरथ पुत्र वियोग में प्राण त्याग देते हैं। वनवास की यात्रा श्री राम, सीता और लक्ष्मण वन-वन भटकते हुए ऋषि-मुनियों के आश्रमों में जाते हैं। वे ऋषियों की रक्षा करते हैं और राक्षसों का संहार करते हैं। चित्रकूट में कुछ समय निवास के बाद वे दंडकारण्य की ओर बढ़ते हैं। पंचवटी में कुटिया बनाकर निवास करते हैं। शूर्पणखा प्रसंग और सीता हरण पंचवटी में रावण की बहन शूर्पणखा श्री राम पर मोहित हो जाती है। लक्ष्मण द्वारा उसका नाक-कान कटने से क्रोधित होकर वह रावण के पास जाती है। रावण माता सीता के रूप-सौंदर्य पर मोहित होकर उनका हरण करने की योजना बनाता है। मारीच को स्वर्ण मृग का रूप धारण करने को कहता है। मृग के पीछे श्री राम जाते हैं, लक्ष्मण भी कुटिया छोड़ते हैं, और उसी समय रावण साधु का वेश धारण कर माता सीता का अपहरण कर लेता है। जटायु मोक्ष और विलाप रावण का सामना करते हुए गिद्धराज जटायु वीरगति को प्राप्त होते हैं। श्री राम और लक्ष्मण जटायु को मोक्ष प्रदान करते हैं। यह प्रसंग दिखाता है कि सच्ची भक्ति किसी भी रूप में हो, प्रभु उसे स्वीकार करते हैं। शबरी भक्ति और किष्किंधा कांड वन में आगे बढ़ते हुए श्री राम शबरी के आश्रम पहुँचते हैं। शबरी की निष्कपट भक्ति से प्रसन्न होकर प्रभु उनके जूठे बेर स्वीकार करते हैं। यह कथा बताती है कि भगवान भाव के भूखे हैं, भोग के नहीं। इसके बाद श्री राम की भेंट हनुमान जी से होती है, जो उन्हें किष्किंधा ले जाते हैं। वहाँ सुग्रीव और बाली का प्रसंग आता है। श्री राम बाली का वध कर सुग्रीव को राजा बनाते हैं। बदले में सुग्रीव माता सीता की खोज में वानर सेना की सहायता का वचन देते हैं। हनुमान जी की लंका यात्रा माता सीता की खोज में हनुमान जी समुद्र लांघकर लंका पहुँचते हैं। अशोक वाटिका में वे माता सीता को ढूँढ निकालते हैं और श्री राम की मुद्रिका देकर उन्हें आश्वस्त करते हैं। रावण की सभा में हनुमान जी अपनी निर्भीकता से लंका को चुनौती देते हैं और अंततः लंका दहन कर लौट आते हैं। सेतु निर्माण और लंका युद्ध श्री राम समुद्र तट पर पहुँचकर सेतु निर्माण का आदेश देते हैं। नल-नील के नेतृत्व में राम सेतु का निर्माण होता है। वानर सेना लंका पहुँचती है और भीषण युद्ध छिड़ जाता है। मेघनाद, कुम्भकर्ण जैसे पराक्रमी योद्धा मारे जाते हैं। अंततः श्री राम रावण का वध करते हैं। अधर्म का अंत और धर्म की विजय होती है। सीता अग्नि परीक्षा और अयोध्या वापसी लोकमर्यादा के पालन हेतु माता सीता अग्नि परीक्षा देती हैं और पावन सिद्ध होती हैं। पुष्पक विमान से श्री राम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटते हैं। चौदह वर्षों का वनवास पूर्ण होता है। भरत श्री राम को राज्य सौंपते हैं और स्वयं सेवक बनते हैं। श्री राम का राज्याभिषेक होता है।