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हिंदी साहित्य का इतिहास दर्शन बीती हुई घटनाओं का वास्तविक वर्णन होता है इतिहास। इतिहास का अर्थ :- ऐसा था, ऐसा हुआ था। समय-समय पर अलग-अलग साहित्य इतिहास लेखकों ने अपने-अपने ढंग से अपने नजरिए से और अपने तर्क के हिसाब से यथार्थ और घटनाओं को जीस प्रकार देखते हैं और उसकी व्याख्या अपने तरीके से करते हैं। इसे हम उदाहरण से समझ सकते हैं :- देखने का तरीका "आसमान में घने काले बादल आने वाले हैं अलग-अलग लोग इसे अलग-अलग तरीके से समझेंगे और देखेंगे इसी यथार्थ की व्याख्या माना तीन अलग-अलग लोग अपने-अपने तरीके से करते हैं ठीक वैसे ही इतिहास दर्शन घटनाओं की कार्य की प्रक्रिया की व्याख्या जो विद्वान अपने-अपने ढंग से अपने-अपने तरीके से प्रस्तुत करते हैं इसे हमें इतिहास का दर्शन करते हैं। प्रायः इतिहास दर्शन के जनक को लेकर विद्वानों में मतभेद है परंतु वाल्टेयर के संबंध में सामान्य धारणा है कि उन्हें ही हम इतिहास दर्शन का जनक कहते हैं। कॉलिंगवुड के अनुसार :- वाल्टेयर को ही इतिहास दर्शन का जनक बताया और समान्यतः वाल्टेयर को ही इतिहास दर्शन का जनक माना जाता है। प्रो. वाल्स के अनुसार:-विको (इटली के दार्शनिक) को इतिहास दर्शन का जनक माना है। इतिहास दर्शन को लेकर विद्वानों की धारणा वाल्टेयर : "इतिहास दर्शन इतिहास के चिंतन की विधि है इसमें इतिहासकार ऐतिहासिक घटनाओं को दोहराने की बजाय अपने विषय में चिंतन करता है" कॉलिंगवुड: "इतिहास दर्शन इतिहास और इतिहासकार के विचारों का पारस्परिक मेल है" हीगेल: "इतिहास घटनाओं का संकलन भर नहीं है बल्कि घटनाओं के भीतर छिपी कार्य-कारण प्रक्रिया की खोज है" जिस प्रकार "इतिहास" विषय में हम हमारे राजा महाराजा के विषय में पढ़ते हैं, ठीक उसी प्रकार साहित्य के इतिहास में रचनाकार एवं उनके रचनाओं के विषय में पढ़ते हैं तथा उनसे परिचित होते हैं। साथ ही साथ इस रचना के माध्यम से हम उस समय के परिवेश से भी परिचित होते हैं। इस संबंध में शुक्ल का कथन है: - "जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ- साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन हो जाता है आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों को परखते हुए साहित्य परंपरा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही साहित्य का इतिहास कहलाता है।" साहित्य इतिहास दर्शन की इस विकासशील परंपरा का उल्लेख कई साहित्यकारों ने किया है:- तेन के अनुसार: "किसी भी साहित्य के इतिहास को समझने के लिए उससे संबंधित जातीय परंपराओं, राष्ट्रीय और सामाजिक वातावरण एवं सामाजिक परिस्थितियों का अध्ययन विश्लेषण आवश्यक है। जाति, वतावरण और क्षणइसके तीन आधारभूत सूत्र हैं।" डॉक्टर विशंभर नाथ उपाध्याय के अनुसार:- "साहित्येतिहास दर्शन सामान्य इतिहास दर्शन के समानंतर होता है साहित्य इतिहास लेखक को उस सामाजिक संदर्भ को ध्यान रखना चाहिए जिसमें वह साहित्य प्रादुर्भूत हुआ है।" इस संबंध में शुक्ल का इतिहास उल्लेखनीय है।