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A Soordas bhajan. अब कै माधव, मोहिं उबारि। मगन हौं भव अम्बुनिधि में, कृपासिन्धु मुरारि॥ नीर अति गंभीर माया, लोभ लहरि तरंग। लियें जात अगाध जल में गहे ग्राह अनंग॥ मीन इन्द्रिय अतिहि काटति, मोट अघ सिर भार। पग न इत उत धरन पावत, उरझि मोह सिबार॥ काम क्रोध समेत तृष्ना, पवन अति झकझोर। नाहिं चितवत देत तियसुत नाम-नौका ओर॥ थक्यौ बीच बेहाल बिह्वल, सुनहु करुनामूल। स्याम, भुज गहि काढ़ि डारहु, सूर के ब्रज कूल॥ भावार्थ :- संसार-सागर में माया अगाध जल है , लोभ की लहरें हैं, काम वासना का मगर है, इन्द्रियां मछलियां हैं और इस जीवन के सिर पर पापों की गठरी रखी हुई है।इस समुद्र में मोह शेवार है। काम-क्रोधादि की वायु झकझोर रही है। तब एक हरि नाम की नौका ही पार लगा सकती है, परन्तु स्त्री तथा पुत्र का मोह उधर देखने ही नहीं देता।हे करुणा मूल मैं पूरी तरह थक चुका हूं, बेहाल हूं, और व्यथित हूं, कृपा करके मेरा हाथ पकड़ इस भव सागर से मुझे निकालिए और आपकी शरण रूपी ब्रज के ठंडे वातावरण में जगह दीजिये। शब्दार्थ :- अब कैं =अबकी बार ,इस जन्म में। उधारि = उद्धार करो। मगन =मग्न, डूबा हुआ। भव = संसार। अंबुनिधि =समुद्र। ग्राह =मगर। अनंग = काम वासना। मोट =गठरी। सिवार = शैवाल, पानी के अन्दर उगनेवाली घास जिसमें मनुष्य प्रायः फंस जाता है। कूल =किनारा।