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Written & Composed by Jagadguttam Shri Kripalu Ji Maharaj Book 📖: Prem Ras Madira - Dainya Madhuri प्रेम रस मदिरा दैन्य-माधुरी (पद क्रमांक – 4 ) अहो पिय! जब तुम्हरी बनि जैहौं। तव मुख चंद्र, चकोर पियत नित, दृगन न नेकु अघैहौं। है तुम्हरी अपनो करि तुम को, तन मन प्राण लुटैहौं। तव कर परस पाय मदमाती, फूली अंग न समैहौं। नचिहौं बनि उनमादिनि छिन छिन, तुम्हरोइ गुनगन गैहौं। मन भाई 'कृपालु' करि भुज भरि, पुनि पुनि कंठ लगैहौं। भावार्थ- हे प्रियतम श्यामसुन्दर! मैं जब तुम्हारी बन जाऊँगी तब तुम्हारे मुख चन्द्र की रूप माधुरी को निरन्तर पीते हुए भी मेरे नेत्र रूपी चकोर थोड़ा भी तृप्त न होंगे वरन् बार-बार दर्शनों की अभिलाषा बढ़ती ही जायगी। तुम्हारी बनकर एवं तुमको अपना बनाकर, तुम्हारे ही ऊपर आनन्द विभोर होकर अपना तन, मन, प्राण सर्वस्व लुटा दूंगी। तुम्हारे कोमल कर कमलों के मधुर स्पर्श को पाकर मतवाली हो जाऊँगी और उन्मत्त होकर तुम्हारे गुणगान गाती हुई क्षण-क्षण में बार-बार नाचा करूँगी। 'कृपालु' कहते हैं कि फिर मैं भली-भाँति अपनी मनभाई करूँगी एवं सर्वांग आलिंगन पूर्वक बार-बार तुम्हें अपने गले लगाऊँगी।