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Written & Composed by Jagadguttam Shri Kripalu Ji Maharaj Book 📖: Bhakti Shatak & Braj Ras Madhuri तुम मेरे थे रहोगे, यह श्रुति बचन तिहार। अधम उधारन नाथ पुनि, काहे मोहिं बिसार ।।८१।। हे श्यामसुंदर ! तुम अनादिकाल से मेरे थे, औऱ अनन्तकाल तक मेरे बने रहोगे, यह वेदों में तुम्ही ने स्वयं कहा है । फिर अधम उधारन श्रीकृष्ण ! मुझे क्यो भूला दिया ? हौं मानत हौं सदा को, हौं पातक अवतार। अधम उधारन विरद पर, तुम तो करहु विचार।।८२।। हे श्रीकृष्ण ! अनादिकाल से मैंने सदा पाप ही किया है, यह मैं मानता हूँ । किंतु तुम भी तो अपनी पतित पावनी प्रतिज्ञा पर विचार करो । तू ही तो मम बनवारी, पुनि काहे मोहिं बिसारी । नहीं चहत पदारथ चारी, हौं तो हौं प्रेम भिखारी । याचत भई बेर बिहारी, अब तो सुनु टेर हमारी । आयो हौं शरण तिहारी, पुरवहु मम आस मुरारी । हौं परम पतित गिरिधारी, तुम हो पतितन हितकारी । नहीं चहहुं न्याय बनवारी, चह कृपा 'कृपालु'तिहारी ।।