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परम पूज्य श्री 108 आचार्य विद्यासागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री 108 क्षमा जी महाराज के प्रवचन बारह भावना एकत्व भावना Ekatva bhavana आप अकेला अवतरे , मरे अकेला होय | | यों कबहूँ इस जीव को , साथी - सगा न कोय | | ४ | | Apa akela avatare , mard akela hdya | Yon kabahumisa jivakd , sāthi - saga na kaya | | 4 | | 4 . एकत्व भावना - संसार में प्रत्येक मनुष्य अकेला ही । जन्म लेता है और अकेला ही मरण को प्राप्त होता है । उसके साथ कोई भी स्वजन - परिजन नहीं होता है | जीव अपने कर्मों का स्वयं कर्ता और भोक्ता होता है , दूसरा कोई नहीं , ऐसा चिंतन एकत्व भावना है । इससे आत्म - प्रतीति जगती है और स्थिरता आती है । पंडित श्री दोलतराम जी छह ढाला में लिखते हैं शुभ अशुभ करम फल जेते , भोगै जिय एकहिं तेते । सुत दारा होय न सीरी , सब स्वारथ के है भीरी । । / @shubhamjain108