У нас вы можете посмотреть бесплатно 05.अन्यत्व भावना मुनि श्री 108 क्षमा सागर जी महाराज के प्रवचन или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
Если кнопки скачивания не
загрузились
НАЖМИТЕ ЗДЕСЬ или обновите страницу
Если возникают проблемы со скачиванием видео, пожалуйста напишите в поддержку по адресу внизу
страницы.
Спасибо за использование сервиса ClipSaver.ru
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री 108 क्षमा सागर जी महाराज के प्रवचन (अन्यत्व भावना) ( Anyatva bhavana ) जहाँ देह अपनी नहीं , तहाँ न अपना कोय | घर - संपति पर प्रगट ये , पर हैं परिजन लोय | | ५ | | jahan deha apani nahim , taham na apana kdya | Ghara - sampati para pragata ye , para haim parijana loya | | 5 | | 5 . अन्यत्व भावना - यह जो शरीर मैंने धारण कर रखा है , वह मेरा नहीं है , फिर घर - परिवार , कुटुम्ब , जाति धन - वैभव आदि मेरे कैसे हो सकते हैं ? मैं अन्य हूँ । और ये सब मुझसे भिन्न हैं , अलग हैं । शरीरादि तो जड़ हैं , नाशवान हैं , अस्थिर हैं , क्षणभंगुर हैं । मैं तो आत्मा हूँ , चेतना हूँ , शाश्वत हूँ । शरीरदि में मोह - आसक्ति रखना हितकारी नहीं है । जिस प्रकार तिल से तिल और खली , धान से छिलका , फलों से गुठली और रस अलग हो जाता है उसी प्रकार यह शरीर और आत्मा भिन्न - भिन्न है । ऐसी दृढ़ प्रतीति अन्यत्व भावना के चिंतन से ही सम्भव है । Ekatva bhavana :, • 04.एकत्व भावना मुनि श्री 108 क्षमा जी महा... / @shubhamjain108 Shubham Jain