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बारह भावना परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री 108 क्षमा सागर जी महाराज के प्रवचन (अशुचि भावना ) ( Asuci bhavana ) दिपे चाम - चादर - मढ़ी , हाड़ - पींजरा देह । । भीतर या - सम जगत् में , अवर नहीं घिन - गेह | | ६ | | Dipe cāma - cadara - marhi , hara - pinjara deha | Bhitara ya - sama jagat mem , avara nahini ghina - geha | | 6 | | अशुचि भावना - शरीर रक्त - माँस - मज्जा - मल - मूत्र आदि घृणित पदार्थों से बना हुआ पिण्ड है । शरीर जिसमें आत्मा प्रतिष्ठित है उसे सजाने - सँवारने की अपेक्षा साधने की आवश्यकता है । संयमादि से शरीर को साधा जाता है । सधे हुए शरीर में रहकर आत्मा के अनन्त ज्ञान - दर्शनादि गुणों को प्रकट किया जा सकता है । उदाहरण सनत्कुमार के अशुचि भावना का जब चक्रवर्ती सनत्कुमार को अपने रूप का दम्भ हो गया तो परीक्षा करने आये ब्राह्मण रूपी देवों ने कहा कि है राजन् ! तुम्हारा यह शरीर रोगों का वास है । असंख्यात कीटाणु इसमें भरे पड़े हैं । इसलिए इस पर गर्व मत करो । देवों के कहने पर राजा ने पात्र में थूका | थूक में बिलबिलाते असंख्यात कीड़े दिखाई दिये । उसी पल उसे शरीर की अशुचि का भान हुआ और शरीर से वैराग्य हुआ | - • 05.अन्यत्व भावना मुनि श्री 108 क्षमा सागर ... Shubham Jain - / @shubhamjain108