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IMAAN NEWS 9th March 2026 MAULA ALI... a Timeless Horizon of the Humanity मौला अली… इंसानियत का एक ला-ज़वाल उफ़ुक़ #sayedasifjah #imaannews #BaatImaanKi_BaatInsaanKi #news #muslimnews #insaniyat #peace #Ali #MaulaAli #ImamAli @AliIbneAbuTalib #FirstImam #ForthCaliph #13Rajab #IslamicHistory #UniversalWisdom #NahjulBalagha #Humanity #Spirituality #TheLionOfGod #SherEKhuda #JusticeForAll #DivineKnowledge #DivinePersonality #PeakOfEloquence #AliForHumanity “बात ईमान की… बात इंसान की।” दस्तार सुर्ख़, साहिब-ए-दस्तार सुर्ख़-रू; मस्जिद है और, हैदर-ए-कर्रार सुर्ख़-रू। ज़रबत की शब रखी गई, बुनियाद-ए-करबला; कुछ अरसा बाद होगा, इक इनकार सुर्ख़-रू।। तारीख़-ए-इंसान में कुछ ऐसे दरख़्शां नाम हैं जो किसी एक मज़हब या फिरके की मिल्कियत नहीं, बल्कि तमाम बशरियत के लिए हिदायत का हमेशा रहने वाला सरचश्मा हैं। उन्हीं पाक नामों में 'अली इब्न अबू तालिब' (अ.स.) का नाम सबसे रोशन दिखाई देता है। मौला अली की ज़िंदगी अक़्ल, अद्ल, इबादत और इंसानियत की ऐसी मुकम्मल किताब है, जिसे हर दौर का इंसान पढ़कर रास्ता पा सकता है। आज 19 रमज़ान-उल-मुबारक, ‘यौम-ए-ज़रबत’ है — वह दिन जब इंसानियत के सबसे बड़े मुहाफ़िज़ पर ज़ुल्म की वह तलवार चली, जिसने सिर्फ़ एक शख़्स को नहीं, बल्कि हक़ और इंसाफ़ के अलमबरदार को निशाना बनाया। मस्जिद-ए-कूफ़ा में फ़ज्र की नमाज़ के दौरान, जब आप सजदे में थे, ख़ारजी इंतहापसंद अब्दुर्रहमान इब्ने मुलजिम ने ज़हर में बुझी तलवार से वार किया। वार इतना गहरा था कि जिब्रील-ए-अमीन की ये सदा गूँजी: "क़द क़ुतेला अमीरुल मोमिनीन" — और इधर मौला की ज़ुबान पर "फ़ुज़्तु बि-रब्बिल काबा"। मौत को भी आपने कामयाबी का एलान बना दिया। अगरचे तेग़ चलाई थी, इब्ने मुल्जिम ने; मगर तवील है, फ़ेहरिस्त ए क़ातिलान ए अली। मकतब-ए-अहलुलबैत की नज़र से इमाम अली (अ.स.) सिर्फ़ चौथे ख़लीफ़ा नहीं, बल्कि “इंसान-ए-कामिल” हैं। सूफ़िया, उलेमा और दानिश्वर ने उन्हें हमेशा हक़ और बातिल के दरमियान तराज़ू क़रार दिया। आपकी एक जुमले ने इंसानी हुक़ूक़ और गवर्नेंस की बुनियाद रख दी: मालिक-ए-अश्तर के नाम ख़त में आपने लिखा: “ऐ मालिक! याद रखो कि तुम्हारी रिआया में दो तरह के लोग हैं: या तो वे मज़हब में तुम्हारे भाई हैं, या तख़्लीक़ में तुम्हारे जैसे इंसान।” आज भी दुनिया इस ख़त को बेहतरीन गवर्नेंस चार्टर मानती है; यूनाइटेड नेशंस में भी इसका हवाला दिया गया है। आधी दुनिया पर हुकूमत के बावजूद जौ की सूखी रोटी, फटा जूता अपने हाथ से टाँकना — ये वही अली हैं जिनके लिए ताक़त का मतलब कमज़ोरों के आँसू पोंछना था। नबी-ए-करीम (स.अ.व.व.) ने आपको “बाब-उल-इल्म” कहा। आप फ़रमाते थे: “सेलूनी क़ब्ल अन तफ़्क़िदूनी” — मुझसे पूछ लो, इससे पहले कि मैं तुम्हारे दरमियान न रहूँ। जंग-ए-ख़ैबर में क़िला-ए-क़ैबर का दरवाज़ा उठाना हो या ख़ंदक़ में अम्र इब्न अब्दवुद का सामना, ज़ुल्फ़िक़ार हमेशा हक़ के लिए उठी, मगर असली शुजाअत उस वक़्त नज़र आई जब दुश्मन ने चेहरे पर थूका और आपने उसे छोड़ दिया, ताकि जंग नफ़्सानी बदले में न बदले। ज़र्बत के बाद, शदीद तकलीफ़ में भी आपकी फ़िक्र अपनी ज़ात नहीं, उम्मत और इंसाफ़ के लिए थी। जब इब्ने मुलजिम को बाँध कर लाया गया, आपने अपने बेटों से फ़रमाया कि जो खाना तुम खाओ, वही इसे खिलाओ; जो पानी तुम पियो, वही इसे पिलाओ। और हुक्म दिया कि अगर मैं न रहूँ, तो इस पर सिर्फ़ एक ही वार करना, क्योंकि इसने भी एक ही वार किया है, और किसी का हाथ-पैर न काटना — यहाँ तक कि पागल कुत्ते पर भी “मुसला” से मना फ़रमाया। क्या तारीख़ में ऐसा इंसाफ़ किसी और ने दिखाया? 21 रमज़ान की उस रात को, जब ज़हर सारे जिस्म में फैल चुका था, कूफ़ा के यतीम घर के बाहर दूध लेकर खड़े थे, कि शायद मौला की तकलीफ़ कम हो जाए — वो उसी शख़्स के लिए परेशान थे जिसने कभी उन्हें यतीम महसूस नहीं होने दिया। आपकी वफ़ात के साथ ख़िलाफ़त-ए-राशिदा का वो दौर भी रुख़्सत हुआ, जिसने दुनिया को अदल-ओ-इंसाफ़ की अस्ल तस्वीर दिखाई। आज भी जब 19 रमज़ान को हम मातम करते हैं, तो ये सिर्फ़ एक ज़ख़्मी सर का मातम नहीं, बल्कि इंसाफ़ के क़त्ल और अद्ल के लहू का मातम है। अली (अ.स.) आज भी ज़िंदा हैं — अदालत के हुक्मों में, मज़लूमों की आहों में, और हर उस दिल में जो ज़ुल्म के सामने झुकने से इंकार करता है। उन्नीसवीन है, आप का मातम है, या अली, ख़ून हो गया, दिलों का ये आलम है, या अली, दफ़्तर जहाँ का दरहम-ओ-बरहम है, या अली, माह-ए-सयाम, माह-ए-मोहर्रम है, या अली; मौला की नज़र करने को, ये अश्क लाए हैं, हम रोज़-दार आप के पुरसे को आये हैं।'' ऐ मौला-ए-कायनात… ऐ हल्लाल-ए-मुश्किलात, ऐ ग़ालिब-ए-कुल्ले-ग़ालिब, ऐ इमाम अली इब्ने अबू तालिब! आपकी ज़ात-ए-गिरामी पर करोड़ों सलाम — आप काबा में पैदा हुए, मस्जिद में सजदे की हालत में शहीद हुए; आपने हमें जीना भी सिखाया और मौत को फ़तह बना कर दिखा दिया। या अली बर मन दिल ए दानिश कुशा; मोम कुन, संग ए दिल ए बहर ए खुदा! ला फ़ता दर शान तू, फ़रमुदाह: हक़; बाब-ए-शह-ए-इल्म, खानम, या मोहम्मद मुस्तफा! …………++++………… Sayed Asif Jah, a Bold Voice in Journalism: A new YouTube channel has been launched on 1st August 2025, with a distinct mission, to present current news with a Muslim perspective. At the helm of this initiative is veteran journalist Sayed Asif Jah, a respected name in Indian media, who has served for decades in leading newspapers, magazines, and TV news channels across Hindi, English, and Urdu. He has served 'TVI', India's first news channel as Mumbai head to name a few. This is not just a news channel, it’s a movement of media inclusivity, led by a journalist who understands the responsibility that comes with the camera and the mic.