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IMAAN NEWS 10th March 2026 20th Ramazan… The Last Day of MAULA ALI (A.S.) in this World 20 रमज़ान… इस दुनिया में मौला अली (अ.स.) का आखिरी दिन #sayedasifjah #imaannews #BaatImaanKi_BaatInsaanKi #news #muslimnews #insaniyat #peace #ImamAli #MartyrdomOfAli #21Ramadan #FuztoBeRabbeKaba #JusticeOfAli #LionOfAllah #MulaAli #IslamicHistory #SpiritualLegacy #Ahlulbayt #RamadanRemembrance “बात ईमान की… बात इंसान की।” आज 20 रमज़ानुल मुबारक है, और फिज़ाओं में एक अजीब सी उदासी है और तारीख़-ए-इस्लाम का वो पन्ना खुला हुआ है जिसे पढ़ते ही रूह कांप जाती है। कूफ़ा की गलियां ख़ामोश हैं, लेकिन मस्जिद-ए-कूफ़ा की दीवारें आज भी उस लहू की गवाही दे रही हैं जो सजदे की हालत में ज़मीन पर गिरा था। ये वो दिन है जब इस्लाम का सबसे निडर मुजाहिद, 'बा़ब-उल-इल्म', और रसूले अकरम ﷺ का सबसे अज़ीज़ भाई, हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) अपनी ज़िंदगी की आख़िरी घड़ियाँ गुज़ार रहे थे। ज़हर में बुझी तलवार ने सर-ए-मुबारक को चीर दिया था, जिस्म से खून बह रहा था, लेकिन उस चेहरे पर जो नूर और इत्मीनान था, वो ज़माने के लिए एक दर्स बन गया। जब इब्ने मुल्ज़िम की तलवार ने सजदे की हालत में वार किया, तो मौला अली के लबों से जो जुमला निकला, उसने कायनात को हिला कर रख दिया: "फ़ुज़्तु बे रब्बे काबा" । इंसानी तारीख़ में मौत को हमेशा एक ख़ौफ़ या विदा के तौर पर देखा गया है, लेकिन अली इब्ने अबी तालिब ने मौत के दस्तक देते ही अपनी कामयाबी का ऐलान किया। बद्र की जंग में, अली ने कुरैश के उन सरमायदारों और बड़े नामचीन योद्धाओं को मौत के घाट उतारा था, जो बनी उमय्या और अन्य अरब क़बीलों के 'फख्र' माने जाते थे। उत्बा, शायबा और वलीद जैसे लोग, जो मुआविया और अबू सुफियान के सगे-संबंधी थे, अली के हाथों मारे गए। इसी तरह ख़ैबर की जंग में, मरहब जैसे अजेय योद्धा का सर कलम करके अली ने यहूदी ताक़त की कमर तोड़ दी थी। ये घाव उन खानदानों के लिए सिर्फ हार नहीं थे, बल्कि यह उनकी 'क़बीलाई अना' (Tribal Ego) पर चोट थी। हालांकि बाद में कई लोगों ने ज़ाहिरी तौर पर इस्लाम कुबूल कर लिया, लेकिन उनके दिलों में "बद्र और उहुद का बदला" लेने की आग ठंडी नहीं हुई थी। तारीख़ गवाह है कि जंग-ए-सिफ़्फ़ीन में और बाद में कूफ़ा की गलियों में जो साज़िशें बुनी गईं, उनके पीछे वही पुराना इंतकाम काम कर रहा था। इब्ने मुल्ज़िम तो महज़ एक मोहरा था, असल में वह तलवार उन रंजिशों के हाथ में थी जो अली के 'इंसाफ़' और उनकी 'ज़ुल्फ़िकार' से खौफज़दा थे। मौला अली की शख्सियत को समझने के लिए हमें उस सफ़र को देखना होगा जो ग़दीर-ए-ख़ुम से शुरू होकर मस्जिद-ए-कूफ़ा के सजदे पर मुकम्मल हुआ। 10 हिजरी में रसूल ﷺ ने हज्जतुल विदा से लौटते हुए हज़ारों के मजमे में अली का हाथ बुलंद करके कहा था— "मन कुन्तु मौलाहु फ़हाज़ा अलीय्युन मौलाह" (जिसका मैं मौला हूँ, उसका ये अली मौला है)। लेकिन रसूल ﷺ के पर्दे के बाद अरब की सियासत ने नया रुख़ इख्तियार किया। जहाँ अली रसूल के ग़ुस्ल और दफ़्न में मसरूफ़ थे, वहीं सक़ीफ़ा में हुकूमत के फैसले हो रहे थे। अली ने अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं के लिए कभी तलवार नहीं उठाई। उन्होंने 25 साल तक सब्र किया ताकि इस्लाम की बुनियादें कमज़ोर न हों। मौला अली का दौर-ए-ख़िलाफ़त (656–661 ई.) आज़माइशों का दौर था। एक तरफ़ शाम (सीरिया) के गवर्नर मुआविया इब्ने अबू सूफ़ियान थे, जो बनी उमय्या की पुरानी क़बीलाई सियासत को दोबारा ज़िंदा कर रहे थे। दूसरी तरफ़ खवारिज़ जैसे गुमराह गिरोह थे। बनी उमय्या का मुक़ाबला करना इसलिए मुश्किल था क्योंकि वे सियासत में 'धोखे' और 'दौलत' का इस्तेमाल कर रहे थे, जबकि अली सिर्फ़ 'क़ुरआन' और 'इंसाफ़' पर डटे हुए थे। मौला अली ने बैतुल-माल (सरकारी खज़ाना) के बटवारे में कभी अपने भाई अक़ील तक को तरजीह नहीं दी। उन्होंने अमीर और ग़रीब, अरब और ग़ैर-अरब के फर्क़ को मिटा दिया। और यही वो सख़्त इंसाफ़ था जो उन लोगों को नागवार गुज़रा जिन्हें पिछली हुकूमतों में मलाई खाने की आदत पड़ गई थी। मौला अली की शहादत महज़ एक ख़लीफ़ा का कत्ल नहीं था, बल्कि ये उस सोच का कत्ल था जो समाज में बराबरी और इंसाफ़ चाहती थी। लेकिन सदियाँ गुज़र जाने के बाद भी, मुआविया और बनी उमय्या का नाम सिर्फ़ तारीख़ की किताबों में दफ़्न है, जबकि अली इब्ने अबी तालिब का नाम दुनिया के हर कोने में इंसाफ़, बहादुरी और इल्म की मिसाल के तौर पर ज़िंदा है। अली ने अपनी शहादत से यह साबित कर दिया कि हक के लिए मर जाना, बातिल के सामने झुककर जीने से कहीं ज़्यादा अज़ीम है। आज 20 रमज़ान की रात, जब हम उस अज़ीम शख़्सियत को याद करते हैं, तो हमें सोचना चाहिए कि क्या हम उनके बताए हुए 'इंसाफ़' और 'इंसानियत' के रास्ते पर चल रहे हैं? अली की कामयाबी का राज़ उनकी 'पाकीज़ा ज़िंदगी' थी। उन्होंने दुनिया को जीता नहीं, बल्कि दुनिया को ठुकरा कर खुदा के दिल को जीता। अल्लाह हमें मौला अली (अ.स.) के नक़्श-ए-कदम पर चलने की तौफीक अता फरमाए। आमीन। …………++++………… Sayed Asif Jah, a Bold Voice in Journalism: A new YouTube channel has been launched on 1st August 2025, with a distinct mission, to present current news with a Muslim perspective. At the helm of this initiative is veteran journalist Sayed Asif Jah, a respected name in Indian media, who has served for decades in leading newspapers, magazines, and TV news channels across Hindi, English, and Urdu. He has served 'TVI', India's first news channel as Mumbai head to name a few. This is not just a news channel, it’s a movement of media inclusivity, led by a journalist who understands the responsibility that comes with the camera and the mic.