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IMAAN NEWS 15th March 2026 'आधा गांव' के डॉ. राही मासूम रज़ा की पूरी दास्तान Complete Story of Dr. Rahi Masoonm Reza, of Aadha Gaon #bollywoodnewsnet #sayedasifjah #bollywood #film #cinema #movie #jaicinema #chalchitra #news #RahiMasoomRaza #GangaKaBeta #AdhaGaon #MahabharatWriter #HindiCinema #UrduAdab #GangaJamuniTehzeeb #IndianScreenwriting #1857KrantiKatha बात ईमान की... बात इंसान की... अदब और सिनेमा के उफ़क़ पर जब भी किसी ऐसे शख़्स का ज़िक्र आता है जिसने एक मुसलमान होते हुए भी पूरे मुल्क की रूह को अपनी क़लम से छू लिया, तो सबसे पहले नाम आता है डॉ. राही मासूम रज़ा का। 15 मार्च 1992 को मुंबई के एक अस्पताल में कैंसर से लंबी जद्दोजहद के बाद उनका इंतिक़ाल हुआ और हिन्दुस्तानी फ़िक्र व फ़न के एक पूरे दौर का इख़्तिताम हो गया। 1 अगस्त 1927 को ज़िला गाज़ीपुर के गाँव गंगौली में एक शिया मुस्लिम ख़ानदान में राही साहब की पैदाइश हुई। वो फ़ख़्र से कहा करते थे, “मैं गंगा का बेटा हूँ।” उनकी नज़र में गंगा सिर्फ़ एक नदी नहीं, एक मुक़द्दस निशान थी जो यह साबित करती है कि इस सरज़मीन की रगों में मुस्लिम भी उतने ही हक़दार हैं जितने कोई और। गंगौली की यही मिट्टी, यही अज़ान और मंदिर की घंटियाँ, यही मिल–जुल कर जीने वाली ज़िंदगी बाद में “आधा गाँव”, “नीम का पेड़”, “कटरा बी आर्ज़ू” और “दिल एक सादा काग़ज़” में झलकती है – जहाँ मुसलमान किरदार सिर्फ़ “minority” नहीं, बल्कि उस पूरे मंजर का मरकज़ हैं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से “तिलिस्म–ए–होशरुबा” पर पीएचडी, उर्दू की तालीम और अदबी हलक़ों में मुहतबर मक़ाम – यह सब उनकी “उम्मत” और “कौम” दोनों के लिए जद्दोजहद का हिस्सा था। सत्तर–अस्सी की दहाई में “मैं तुलसी तेरे आँगन की”, “मिली”, “तवायफ़”, “गोलमाल”, “कर्ज़”, “जुदाई”, “लम्हे”, “परंपरा”, “आइना”, “नाचे मयूरी” जैसी फ़िल्मों के लिए उनके मुक़ालमे और स्क्रिप्ट ने हिंदी–उर्दू सिनेमा की ज़बान को वो तहज़ीब दी जिसमें एक मुसलमान का अहसास, लफ़्ज़ों का लिहाज़ और इंसानी जज़्बात की गहराई साफ़ दिखती है। “तवायफ़” और “मैं तुलसी तेरे आँगन की” जैसे विषयों पर काम करते हुए भी उन्होंने मज़हब और अदब दोनों की हदों का एहतराम रखा – यही एक सच्चे मुसव्विर–ए–कलाम की निशानी है। दूरदर्शन का “महाभारत” राही मासूम रज़ा के लिए सिर्फ़ एक Writing assignment नहीं था, एक इम्तिहान भी था – कि क्या एक मुसलमान इस मुल्क की सबसे अहम हिंदू दास्तान को ईमानदारी से बयान कर सकता है या नहीं। जब बी.आर. चोपड़ा ने एक मुसलमान को चुना और communal एतराज़ात उठे, तो राही साहब ने मुसलमान होने की शर्मिंदगी नहीं, बल्कि एक हिंदुस्तानी होने का फ़ख़्र दिखाया। उन्होंने मुस्कुरा कर कहा: “अब तो मैं ही ‘महाभारत’ लिखूँगा, क्योंकि मैं गंगा का पुत्र हूँ।” अफ़साना और नॉवेल में “आधा गाँव” उनकी असल शिनाख़्त बन गया – गंगौली के ज़रिए पूरे हिन्दुस्तान के मुसलमानों और उनके पड़ोसियों की कहानी। एक तरफ़ मस्जिद, मजलिस, मुहर्रम, दूसरी तरफ़ कुम्भ, मेले, मेल–मिलाप – और फिर तक़सीम के बाद दिलों में पैवस्त होता हुआ शुब्हा और नफ़रत। इसी सिलसिले में उनका सवाल आज भी चुभता है: यह सवाल दरअसल हर उस बस्ती का है जहाँ “मुसलमान, हिंदू” की सियासी लेबलिंग इंसान और पड़ोसी की असली पहचान पर भारी पड़ जाती है। “टोपी शुक्ला”, “हिम्मत जौनपुरी”, “कटरा बी आरज़ू”, “अठारह सौ सत्तावन / क्रान्ति–कथा” – हर जगह उन्होंने मज़लूम की हिमायत और ज़ालिम पर चोट को एक मुसलमान अदबी ज़िम्मेदारी की तरह निभाया। ज़बान और पहचान पर उनकी सबसे ताक़तवर आवाज़ उनकी नज़्म “मेरा नाम मुसलमानों जैसा है…” में सुनाई देती है: “मेरा नाम मुसलमानों जैसा है, मुझको क़त्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो, लेकिन मेरी नस–नस में गंगा का पानी दौड़ रहा है… मेरे लहू से चुल्लू भरकर महादेव के मुँह पर फेंको, और उस जोगी से ये कह दो – महादेव, अब इस गंगा को वापस ले लो, ये मलिच्छ तुर्कों के बदन में गाढ़ा गर्म लहू बन कर दौड़ रही है।” 15 मार्च 1992 को उनका सफ़र ख़त्म हुआ, 16 मार्च को सांताक्रूज़ क़ब्रिस्तान में सुपुर्द–ए–ख़ाक किए गए। कई रिवायतों में आता है कि उनका दिल चाहता था कि गंगा किनारे गाज़ीपुर में दफ़्न हों – यानी गंगा, जिसने उन्हें “गंगापुत्र” बनाया, वही उनकी आख़िरी आहट सुने – मगर तक़दीर ने उन्हें मुंबई की मिट्टी में सुला दिया। वो चले गए, लेकिन से उनकी “आदमियत” और “हिंदुस्तानियत” आज भी उनके अफ़सानों, नज़्मों, फ़िल्मों और धारावाहिकों में सांस ले रही है। उनके ही अल्फ़ाज़ में उनकी विरासत का निचोड़ देखिए: “ज़ख्म जब भी कोई ज़ेहन–ओ–दिल पर लगा, ज़िंदगी की तरफ़ एक दरीचा खुला, हम भी गोया किसी साज़ की तार हैं, चोट खाते रहे, गुनगुनाते रहे।” एक मुसलमान नज़रिए से यही सबक़ है – ज़ख्मों से घबराना नहीं, उन्हें सब्र, शुकर और तख़्लीक़ का ज़रिया बना देना है। राही मासूम रज़ा हमें यह सिखाते हैं कि मुसलमान होकर भी, या शायद मुसलमान होने की बरकत से, इंसानियत और इंसाफ़ की आवाज़ सबसे बुलंद रखी जा सकती है। ================================== Sayed Asif Jah, a Bold Voice in Journalism: A new YouTube channel has been launched on 1st August 2025, with a distinct mission, to present current news with a Muslim perspective. At the helm of this initiative is veteran journalist Sayed Asif Jah, a respected name in Indian media, who has served for decades in leading newspapers, magazines, and TV news channels across Hindi, English, and Urdu. He has served 'TVI', India's first news channel as Mumbai head to name a few. This is not just a news channel, it’s a movement of media inclusivity, led by a journalist who understands the responsibility that comes with the camera and the mic.