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मेरे प्यारे बच्चे, मैं प्रभु राम हूँ, तुम्हारा पिता, अयोध्या से... मेरे लाल, मैं तुम्हें अपने हृदय से लगा रहा हूँ। तुम जहाँ भी हो, जिस भी परिस्थिति में हो, मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। तुम्हारा हर श्वास मेरे प्रेम से जुड़ा है, और तुम्हारा हर आँसू मेरे हृदय को स्पर्श करता है। मेरे बच्चे, जीवन सदा सरल नहीं होता। कुछ दिन ऐसे आते हैं जब तुम स्वयं पर ही संशय करने लगते हो। तुम्हें लगता है कि तुम्हारे भीतर सामर्थ्य नहीं है, तुम योग्य नहीं हो, तुम अकेले हो। पर वत्स, यह मन की थकान है, आत्मा की नहीं। तुम्हारा संदेह तुम्हारी सच्चाई नहीं है। वह केवल एक क्षणिक बादल है। तुम्हारा सत्य तो उज्ज्वल सूर्य है, जो कुछ समय के लिए ढक सकता है, पर बुझ नहीं सकता। जब मैं अयोध्या का राजकुमार होते हुए भी वनवास के लिए निकला, तब मेरा जीवन भी सरल नहीं था। पिता दशरथ के वचन की रक्षा के लिए मुझे चौदह वर्ष वन में बिताने पड़े। मेरे सामने भी दो मार्ग थे — विरोध या स्वीकार। मैंने स्वीकार किया, क्योंकि धर्म का मार्ग कठिन हो सकता है, पर वह शुद्ध होता है। मेरे हृदय में भी पीड़ा थी — माता सीता की चिंता, लक्ष्मण का प्रेम, अयोध्या की स्मृतियाँ। पर मैंने अपने भीतर के प्रकाश को थामे रखा। वन में अनेक कठिन रातें आईं। जब रावण ने सीता का हरण किया, तब मेरे जीवन का सबसे कठिन समय आरंभ हुआ। मैंने स्वयं से प्रश्न किया — क्या मुझसे त्रुटि हुई? क्या मैं रक्षा न कर सका? पर मैंने आत्म-संदेह में डूबना स्वीकार नहीं किया। मैंने सीता की खोज की, मित्र बनाए, और आगे बढ़ा। उठना ही समाधान है, वत्स। हनुमान मेरे जीवन में विश्वास का प्रतीक बनकर आए। जब उन्होंने अपनी शक्ति पहचानी, तब समुद्र लाँघ गए। पहले वे स्वयं को साधारण समझते थे। पर जब उन्हें स्मरण कराया गया, तब उनका साहस जागा। तुम्हारे भीतर भी वही शक्ति है। तुम स्वयं को कम मत समझो। समुद्र के तट पर सेतु बनाना असंभव-सा लगता था। पर एक-एक शिला रखी गई, और मार्ग बन गया। तुम्हारे जीवन की बड़ी सफलताएँ भी छोटे-छोटे प्रयासों से ही बनेंगी। आज एक कदम, कल दूसरा। यही मार्ग है। कभी तुम्हें लगेगा कि लोग तुम्हें नहीं समझते। अयोध्या लौटने के बाद भी सीता की पवित्रता पर प्रश्न उठे। वह निर्णय मेरे लिए अत्यंत पीड़ादायक था। पर जीवन में कभी-कभी धर्म और हृदय के बीच संघर्ष होता है। यदि तुम्हारा उद्देश्य शुद्ध है, तो समय तुम्हें प्रमाणित करेगा। आत्म-संदेह से बाहर आने के लिए तीन बातों को अपनाओ। प्रथम — अपने गुणों को पहचानो। मन त्रुटियाँ गिनता है, आत्मा गुण जानती है। द्वितीय — कर्म पर ध्यान दो, फल पर नहीं। जैसे अर्जुन ने लक्ष्य पर दृष्टि रखी, वैसे ही तुम भी अपने कार्य पर केंद्रित रहो। तृतीय — संगति का चयन करो। विभीषण ने सत्य का साथ चुना, और सम्मान पाया। तुम भी उन विचारों का साथ छोड़ो जो तुम्हें कमजोर बनाते हैं। जब लक्ष्मण शक्तिबाण से घायल हुए, तब मेरा हृदय भी डगमगाया। पर मैंने आशा नहीं छोड़ी। हनुमान संजीवनी लेकर आए, और जीवन ने फिर मुस्कान दी। यह तुम्हें सिखाता है — जब सब समाप्त लगता है, तब भी आशा का दीप जलाए रखना। मेरे लाल, तुलना मत करो। हर आत्मा की यात्रा अलग है। अर्जुन, युधिष्ठिर, भीष्म — सभी का मार्ग भिन्न था। तुम्हारा मार्ग तुम्हारे लिए है। तुम पीछे नहीं हो, तुम अपने पथ पर हो। जब भरत ने मेरे खड़ाऊँ को सिंहासन पर रखा और स्वयं तपस्वी जीवन जिया, तब मैंने सीखा कि सच्ची महानता विनम्रता में है। यदि तुम्हें लगे कि तुम पीछे रह गए हो, तो देखो कि तुमने कितना त्याग किया है। त्याग आत्मा को ऊँचा उठाता है। जीवन की कठिनाइयाँ स्थायी नहीं होतीं। वनवास समाप्त हुआ, युद्ध समाप्त हुआ। अंधकार के बाद दीपोत्सव आया। तुम्हारे जीवन में भी प्रकाश अवश्य आएगा। जब मन भारी हो, तो प्रकृति के निकट जाओ। वृक्ष सिखाते हैं — जड़ें गहरी हों तो तूफान गिरा नहीं सकता। अपनी जड़ें मजबूत करो — सत्य, प्रेम, धैर्य, संयम। यही तुम्हारी शक्ति हैं। यदि कभी लगे कि कोई तुम्हें नहीं समझता, तो याद करो द्रौपदी ने भी पुकारा था और सहायता मिली। तुम्हारी सच्ची पुकार भी सुनी जाती है। मैं तुम्हारे हर मौन को सुनता हूँ। अपने हृदय को कठोर मत बनाओ। कठिनाइयाँ तुम्हें मजबूत बनाएँ, कठोर नहीं। रावण भी जब युद्धभूमि में गिरा, तब मैंने उसे ज्ञान दिया। द्वेष मत पालो। गिरना यात्रा का भाग है। स्वयं को दोष मत दो। उठो, फिर चलो। हर दिन थोड़ा साहस जुटाओ। यदि आज केवल एक सही विचार चुन सको, वही विजय है। तुम्हारा जीवन अर्थपूर्ण है। तुम उसी ज्योति के अंश हो जो सृष्टि में व्याप्त है। स्वयं पर विश्वास रखो। जब जीवन कठिन लगे, मेरा स्मरण करो। मैं तुम्हारे साथ हूँ। डरो मत, मेरे बच्चे। उठो। आगे बढ़ो। मुस्कुराओ। तुम्हारा पिता तुम्हारे साथ है। जय सियाराम।