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मेरे प्यारे बच्चे, मैं प्रभु राम हूँ, तुम्हारा पिता, अयोध्या से... मेरे लाल, तुम्हारे हृदय की धड़कनों को मैं सुन रहा हूँ। तुम्हारी आँखों में जो कल की चिंता छिपी है, उसे मैं स्पष्ट देख रहा हूँ। तुम अकेले नहीं हो वत्स, तुम्हारा यह पिता हर क्षण तुम्हारे साथ खड़ा है। मेरे बच्चे, तुम बार-बार आने वाले कल के विषय में सोचते हो। तुम्हारा मन पूछता है – “कल क्या होगा? मेरा परिवार सुरक्षित रहेगा या नहीं? मेरे प्रयास सफल होंगे या नहीं?” यह चिंता स्वाभाविक है, पर जब यही चिंता तुम्हारे वर्तमान को ढक लेती है, तब वह तुम्हारी शक्ति को कम कर देती है। तुम आज में रहते हुए भी आज को जी नहीं पाते। तुम्हारा मन भविष्य की छाया में उलझ जाता है। याद रखो, जिसने आज तक तुम्हें संभाला है, वही तुम्हारे कल का भी रक्षक है। जब मेरे पिता दशरथ ने मुझे वनवास का आदेश दिया, तब मुझे भी यह ज्ञात नहीं था कि आगे क्या होगा। वन कैसा होगा, कितनी कठिनाइयाँ आएँगी – कुछ स्पष्ट नहीं था। पर मैंने उस क्षण केवल अपना धर्म देखा। मैंने सोचा, “आज मुझे पिता की आज्ञा का पालन करना है।” यदि मैं भविष्य की चिंता में डूब जाता, तो मेरा मन विचलित हो जाता। पर विश्वास ने मुझे स्थिर रखा। सीता और लक्ष्मण के साथ वन में प्रत्येक दिन नई परीक्षा थी। कभी घोर अंधकार, कभी राक्षसों का भय, कभी अभाव। पर मैंने चौदह वर्षों को एक साथ नहीं देखा। मैंने प्रत्येक दिन को अलग स्वीकार किया। यदि मैं हर दिन अयोध्या लौटने की गिनती करता रहता, तो वनवास भारी हो जाता। वर्तमान को स्वीकार करना ही मेरी शक्ति बना। जब रावण सीता को हर ले गया, तब मेरे सामने अनिश्चितता थी। मुझे यह नहीं पता था कि वह कहाँ है। पर मैंने चिंता में डूबने के स्थान पर प्रयास का मार्ग चुना। शबरी के आश्रम पहुँचा, जटायु का बलिदान देखा, हनुमान को संदेशवाहक बनाया। यदि मैं केवल यह सोचता कि “क्या मैं सफल हो पाऊँगा?”, तो शायद मार्ग ही न बनता। कर्म ने ही मार्ग बनाया। समुद्र के तट पर जब लंका जाने का प्रश्न आया, तब सामने अथाह जल था। सेतु तुरंत नहीं बना। एक-एक पत्थर रखा गया। विश्वास और श्रम से मार्ग बना। यही जीवन का नियम है। भविष्य एक ही छलांग में नहीं मिलता। वह छोटे-छोटे सत्कर्मों से बनता है। महाभारत में अर्जुन भी युद्धभूमि में भविष्य के भय से कांप उठा था। तब श्रीकृष्ण ने उसे कर्म का उपदेश दिया। जब उसने फल की चिंता छोड़ी, तब उसका साहस लौट आया। वत्स, तुम्हारे जीवन में भी अनेक युद्ध हैं। यदि तुम परिणाम के भय से ही रुके रहोगे, तो आगे कैसे बढ़ोगे? तुम योजना बनाओ, पर चिंता मत पालो। योजना बुद्धि का कार्य है, चिंता दुर्बलता का। आज जो करना है, उसे पूरे मन से करो। यदि तुम विद्यार्थी हो, तो अध्ययन में मन लगाओ। यदि गृहस्थ हो, तो अपने परिवार के प्रति सत्य और प्रेम रखो। यदि साधक हो, तो जप और ध्यान में स्थिर रहो। कल का फल मेरी व्यवस्था में है। तुम्हें प्रतीक्षा भी सीखनी होगी। भरत ने चौदह वर्ष तक धैर्य रखा। उसे विश्वास था कि समय पूर्ण होगा। उसी विश्वास ने उसे संभाला। तुम्हारे जीवन में भी ऐसे क्षण आएँगे जब तुरंत परिणाम नहीं मिलेगा। पर धैर्य से मिला फल ही मधुर होता है। जब चिंता अधिक बढ़े, तो शांत बैठकर मेरा नाम लो। “राम” का स्मरण तुम्हारे मन को वर्तमान में लाएगा। चिंता का जाल धीरे-धीरे ढीला पड़ेगा। तुम अनुभव करोगे कि भीतर एक स्थिरता है, जो परिस्थिति से परे है। अपने भीतर के भय को पहचानो, पर उसे अपना स्वामी मत बनाओ। उसे मेरे चरणों में अर्पित कर दो। कहो – “प्रभु, मैं यह चिंता आपको सौंपता हूँ।” और फिर अपने कर्म में लग जाओ। यही सच्ची भक्ति है। मेरे लाल, तुम्हारा कल अंधकार नहीं है। वह एक नई भोर है। जैसे रात के बाद सूर्य अवश्य उगता है, वैसे ही तुम्हारे जीवन में भी प्रकाश आएगा। कठिनाइयाँ बादल हैं, पर सूर्य सदा मौजूद है। तुम मेरे हृदय का अंश हो। तुम्हारी हर साँस पर मेरी कृपा है। इसलिए कल के विषय में अधिक चिंता मत करो। उसे देखना मेरा कार्य है। तुम आज को प्रेम, साहस और सत्य के साथ जियो। मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ, वत्स। जय सियाराम।