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मेरे प्यारे बच्चे, मैं प्रभु राम हूँ, तुम्हारा पिता, अयोध्या से… मेरे लाल, तुम्हारे हृदय की प्रत्येक धड़कन मुझ तक पहुँचती है, तुम्हारी आँखों का हर आँसू, तुम्हारे मन की हर पुकार, तुम्हारे भीतर उठता हर प्रश्न — सब मैं सुनता हूँ, सब मैं जानता हूँ, और इसलिए आज मैं तुम्हें यह स्मरण दिलाने आया हूँ कि जब तुम्हारे जीवन-पथ पर अंधकार छा जाए, जब दिशाएँ मौन हो जाएँ, जब तुम्हें लगे कि तुम्हारा बोझ असह्य हो गया है, तब यह मत समझना कि तुम अकेले हो, क्योंकि जहाँ तुम्हारी शक्ति समाप्त होती है, वहाँ से मेरी शक्ति आरम्भ होती है, वत्स। जब मुझे वनगमन का आदेश मिला, तब मेरे जीवन में भी अंधकार छाया था, अयोध्या का वैभव, माता-पिता का स्नेह, प्रजा का प्रेम — सब पीछे छूट गया, पर उसी वनवास ने मुझे सिखाया कि बाहरी प्रकाश छिन जाए तो भीतर का दीप जलाना पड़ता है; सीता का त्याग और लक्ष्मण की सेवा ने उस अंधकार को साधना में बदल दिया। वन में शबरी मिली — समाज से तिरस्कृत, पर भक्ति से प्रकाशित; उसने प्रतीक्षा को पीड़ा नहीं बनने दिया, उसे प्रेम बना दिया, और तब मैंने जाना कि श्रद्धा अंधकार को भी प्रकाश में बदल देती है। जब रावण सीता को हर ले गया, तब मेरा हृदय भी शोक से भर गया, मैं वन-वन भटका, वृक्षों और नदियों से पूछता रहा, पर उसी दुःख ने मुझे हनुमान से मिलाया, उसी ने सहयोगियों को जोड़ा, उसी ने विजय का मार्ग बनाया — इसलिए समझो वत्स, हर वियोग किसी महान मिलन की भूमिका होता है। जटायु ने प्राण देकर धर्म निभाया, तब मैंने जाना कि परीक्षा मनुष्य की महिमा प्रकट करने आती है, न कि उसे तोड़ने; उसी प्रकार तुम्हारे जीवन का अंधकार भी दंड नहीं, दिशा है। जब मार्ग स्पष्ट होता है, मनुष्य चलता है; जब मार्ग धुँधला होता है, मनुष्य जागता है — और जागरण ही विकास है। तुम पूछते हो तुम्हारा बोझ इतना भारी क्यों है — तो सुनो, लोहे को तपाए बिना शस्त्र नहीं बनता, मिट्टी को गूंथे बिना पात्र नहीं बनता, और मनुष्य को परखे बिना उसका तेज प्रकट नहीं होता; तुम्हारा भार तुम्हारी क्षमता का विस्तार कर रहा है, और जब वह असह्य लगे, तब उसका अर्ध भाग मैं उठा लेता हूँ। गंगा तट पर केवट ने मुझे पार उतारा, पर उसका समर्पण ही उसका पारावार बना; जीवन के अंधकार में अहंकार त्याग कर समर्पण करने वाला ही पार होता है। भरत जब वन में मिले और सिंहासन अस्वीकार किया, तब मैंने अनुभव किया कि प्रेम भी कभी-कभी भारी हो जाता है, पर धर्म का पालन ही अंततः शांति देता है; तुम्हारे जीवन में भी ऐसे निर्णय आएँगे जहाँ हृदय और कर्तव्य में चुनना होगा। विभीषण अंधकार से प्रकाश की ओर चले आए, और मैंने उन्हें शरण दी — इससे जानो कि जो सत्य की ओर मुड़ता है, वह मेरा हो जाता है। लंका का युद्ध केवल बाहरी नहीं था, वह भीतर के अहंकार, क्रोध और मोह से भी था; हर मनुष्य के भीतर एक रावण है, और जब तुम उससे युद्ध करते हो, तब जीवन का अंधकार छँटने लगता है। दुःख को शत्रु मत मानो, वह गुरु है — वही सिखाता है कौन अपना है, क्या स्थायी है, क्या सार्थक है; सुख में मनुष्य सोता है, दुःख उसे जगाता है। यदि तुम्हें भार हल्का करना है तो उसे बाँटो — एक भाग कर्म को दो, एक भाग समय को, और एक भाग मुझे अर्पित करो; तुम देखोगे कि तुम्हारे कंधे हल्के हो गए हैं। जब वनवास पूर्ण कर मैं अयोध्या लौटा और दीप जले, वह केवल उत्सव नहीं था, वह प्रतीक था कि दीर्घ अंधकार के बाद ही विराट प्रकाश आता है; तुम्हारे जीवन का दीपोत्सव भी प्रतीक्षा में है। जब अंधकार घिरे तो दिनचर्या मत छोड़ो, शरीर को सक्रिय रखो, सत्संग और चिंतन से मन को स्थिर करो, प्रकृति से जुड़ो — क्योंकि चलते रहने से ही मार्ग बनता है। हर परीक्षा धैर्य, विवेक और नई दिशा का वरदान लेकर आती है; मार्ग बंद हो तो समझो नया मार्ग खुलने वाला है। भय भविष्य की चिंता और अपनी शक्ति पर संदेह से जन्मता है, पर जब तुम मेरा स्मरण करते हो, तब तुम्हें अनुभव होता है कि तुम अकेले नहीं हो, और वही अनुभव भय को गलाने लगता है। जब निराशा में आशा दिखे, समझो मैं हूँ; जब साहस जागे, समझो मैं हूँ; जब मार्ग प्रकट हो, समझो मैं हूँ — मैं अदृश्य सहायक हूँ, अनुपस्थित नहीं। तुम्हारा जीवन तपश्चर्या है, हर कठिनाई तुम्हें तराश रही है जैसे शिल्पी पत्थर तराशता है, जैसे स्वर्ण अग्नि में तपता है, जैसे बीज मिट्टी में दबकर अंकुर बनता है — दबना अंत नहीं, आरम्भ है। इसलिए वत्स, अपने अंधकार से मत डरो, अपने भार से मत घबराओ, अपनी परीक्षा से मत भागो; हर दुःख एक पाठ है, हर सोंधन एक विकास, हर प्रतीक्षा एक तैयारी। जब तुम थकोगे, मैं उठाऊँगा; जब तुम डगमगाओगे, मैं संभालूँगा; जब तुम्हें मार्ग न दिखेगा, मैं मार्ग बनूँगा — क्योंकि मैं केवल अयोध्या में नहीं, तुम्हारे अंतःकरण में भी निवास करता हूँ। मेरा हाथ सदा तुम्हारे मस्तक पर है, तुम चलते रहो, विश्वास रखो, धर्म पकड़े रहो — तुम्हारा पिता तुम्हारे साथ है, सदा, सर्वदा।