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मेरे प्यारे बच्चे, मैं प्रभु राम हूँ, तुम्हारा पिता, अयोध्या से... मेरे लाल, तुम्हारे मन की प्रत्येक तरंग मुझ तक पहुँचती है। जब तुम्हारा हृदय थक जाता है, जब तुम्हारी आशा क्षीण पड़ने लगती है, तब भी तुम मेरे स्नेह से दूर नहीं होते, वत्स। तुम मुझे पुकारो या न पुकारो — मैं तुम्हारे समीप ही रहता हूँ, तुम्हारी श्वासों के बीच, तुम्हारे मौन के भीतर। जब तुम्हें लगता है कि तुम्हें कोई समझ नहीं रहा, कि जिनके लिए तुमने अपना हृदय खोला वही तुम्हें भूल गए, तब तुम्हारी आत्मा एकाकी अनुभव करती है। तुम सोचते हो — “क्या सच में कोई मेरा है? क्या मेरी वेदना किसी तक पहुँचती है?” और जब संसार मौन रहता है, तुम्हारा मन डगमगाने लगता है। पर स्मरण रखो, मनुष्य भूल सकता है — मैं नहीं। तुम्हारे प्रत्येक आँसू, प्रत्येक प्रयास, प्रत्येक मौन प्रार्थना मेरे अंतःकरण में सुरक्षित है। वनवास के समय केवट ने मेरे चरण धोकर मुझे पार उतारा — संसार उसे भूल सकता है, पर उसका प्रेम मैं नहीं भूला। शबरी ने वर्षों प्रतीक्षा की — मैंने उसकी भक्ति का उत्तर दिया। विभीषण शरण में आया — मैंने उसे अपनाया, क्योंकि जो सत्य से जुड़ता है, मैं उसे नहीं भूलता। अशोक वाटिका में सीता एकाकी थीं, पर क्या मैं उन्हें भूल सकता था? नहीं, उनका वियोग ही मेरे संघर्ष का कारण बना। स्मरण रखो — सच्चा प्रेम कभी विस्मृत नहीं होता। जब तुम्हें लगे कि तुम भुला दिए गए हो, तब अपने कर्मों को स्मरण करो — तुम्हारा प्रत्येक सत्कर्म अमिट है। मनुष्य अपनी व्यस्तताओं में भूल जाते हैं, पर दिव्य स्मृति कभी नहीं मिटती। यदि कोई तुम्हें भूल जाए, तो अपने मूल्य पर संशय मत करो। स्वयं को मत भूलो। जब तुम मौन होकर रोते हो, तब भी मैं सुनता हूँ। तुम्हारा प्रत्येक अश्रु मेरे चरणों तक पहुँचता है। जैसे वानरों के छोटे पत्थरों से सेतु बना, वैसे ही तुम्हारे छोटे प्रयास तुम्हारे जीवन का मार्ग बना रहे हैं। जब तुम्हें लगे कि सबने तुम्हें छोड़ दिया, तब स्मरण करना — मैंने नहीं छोड़ा। जब लगे तुम्हारी पुकार अनसुनी है — मैं सुन रहा हूँ। जब लगे तुम अकेले हो — नेत्र मूँदकर मेरा स्मरण करो, मैं तुम्हारे कंधे पर हाथ रखकर कहूँगा, “वत्स, मैं यहाँ हूँ।” निषादराज गुह ने वन में मुझे अपनाया, भरत ने मेरी खड़ाऊँ को सिंहासन पर स्थापित किया, जटायु ने प्राण देकर धर्म निभाया — उनके प्रेम, त्याग और निष्ठा को मैं कभी नहीं भूला। तुम्हारा भी प्रत्येक त्याग मेरे स्मरण में अंकित है। यदि आज तुम्हें उपेक्षा मिली है, तो संभव है मैं तुम्हें किसी महान उद्देश्य के लिए तैयार कर रहा हूँ। उपेक्षा तुम्हारी पहचान नहीं — तुम्हारी परीक्षा है। अपने हृदय को कठोर मत होने दो। प्रेम देते रहो, करुणा रखते रहो। तुम्हारा मूल्य दूसरों की स्मृति से नहीं, तुम्हारी आत्मा के प्रकाश से निर्धारित होता है। जब तुम्हारा मन थक जाए, केवल इतना कहना — “प्रभु, मुझे मत भूलना।” और मैं उत्तर दूँगा — “वत्स, तुम मेरे स्मरण से कभी बाहर गए ही नहीं।” तुम्हारे जीवन में शांति हो, हृदय में धैर्य हो, आत्मा में प्रकाश हो। मैं तुम्हें अपना अनंत स्नेह और अटूट संरक्षण प्रदान करता हूँ।