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🔥 Mahila Diwas आ रहा है! इस Women’s Day, नारी शक्ति को जागृत करो! 🔥 वर्षों से दबे सवालों को उठाती ये क्रांतिकारी हिंदी कविता – “नारी! आओ बोलो” – जो घूंघट, बुर्का, पितृसत्ता और समाज की कुरीतियों पर सीधा प्रहार करती है। तबले की थाप के साथ रिकॉर्ड की गई ये Tabla Poetry Video आपको झकझोर देगी! “शिव के तीन नयन सोने दो, अपने दो तो खोलो…” कविता का सारांश: माताओं से पूछो – बेटी पर क्यों रोईं, बेटे पर क्यों हँसीं? घर में लड़की से ही काम क्यों करवाया ? समाज से पूछो – समता के अधिकार क्यों छीने? क्यों कुछ bhi हो औरतों पर ही सवाल उठते हैं ? क्यों नारियों को ही पर्दों के पीछे धकेला गया। धर्मों से पूछो – तलाक, पति-पत्नी के नियमों में भेदभाव क्यों? क्यों पत्नी दासी रूप में महिमामंडित करते हो, पति चाहे तो चार शादी कर ले ये कैसी समानता है ? विष्णु और लक्ष्मी के दार्शनिक चित्र को क्यों अपनी सहूलत के अनुसार दर्शाते हो, क्यों कहते हो ये देखकर कि औरत का स्थान तो पैरों में ही है वो मर्द की बराबरी नहीं कर सकती ? अब वक्त है बोलने का! पूर्ण कविता (ट्रांसक्रिप्ट ): [वर्षों से जो बंद पड़े हैं उन नयनों को खोलो नारी ! आओ बोलो, नारी आओ बोलो अब तक जो बुर्कों के पीछे , अब तक जो पुरखों के पीछे अब तक जो मरघट के पीछे , अब तक जो घूंघट के पीछे ढाँप रही हो अपने मुख को, छोड़ के पर्दे बोलो नारी ! आओ बोलो सबसे पहला प्रश्न करो उन माताओं से जाकर रोइ जो लड़की होने पर, हँसी पुत्र को पाकर नारी होकर नारी को ही छोटा समझा सबने नारी होकर नारी ही क्यूँ लगी हृदय को चुभने पूछो की बेटे से ज्यादा हम भी माँगती क्या? ममता और आँचल से ज्यादा हम भी चाहती क्या? अन्न अगर बेटे को देती, हम भी अन्न ही खाती ! बेटे से अन्यत्र तो हम भी सोना नहीँ चबाती। पूछो सबसे भेद किया जिन्होंने भी शिक्षा में लड़की को चूल्हे पर भेजा, लड़के को कक्षा में पूछो उनसे भी जिन्होंने दोनों को पढ़वाया लेकिन घर में लड़की से ही घर का काम कराया। नर को दी आज़ादी उतनी नारी को क्यूँ दी ना? दोनों को ही एक सा रहकर, क्यूँ न सिखाया जीना " लोग कहेंगे क्या " इसका आखेट बनी क्यूँ नारी क्यूँ नारी पर ही थोपी लज्जा की बातें सारी। पूछो सारे प्रश्न, सभी बातों को नापो- तोलो नारी ! आओ बोलो अगला प्रश्न करो समाज से, पूछो ये सब क्या है? समता के अधिकार न रखना, क्षमता की हत्या है। बहलाया , फुसलाया सबने कन्या को अंधी कर चंडी कह कर पूजा की और बिठा दिया मंडी पर। मंडी जिसमे कीमत तय करता है केवल नर ही नर को चाबुक मिली हाथ में नारी को बस डर ही नारी करती रही काम चोटें चाबुक की सहकर आहें भरती रही सदा सह-सहकर, रह-रहकर इस पर भी नर हुआ नहीँ है नारी का आभारी पितृसत्ता में रह गई है नारी मात्र बिचारी नर दाता बन कर के बैठा, औरत बन गई दासी समता के सपनों को सदा से लगती आई फाँसी। पूछो-पूछो आगे बढ़कर सारे ही धर्मों से कुतर्कों को तोड़ो अपने संयम व तर्कों से पूछो सबने नारी को आंका था कम किस कारण? सब ग्रंथों में लगती है क्यूँ नारी निरी भिखारन। देना हो नर को तलाक तो चाहे जब दे जाए और चाहे नारी तो पहले पति से अनुमति पाए नियम खुला के और तलाक के इक जैसे होने थे दोनों के अधिकार यहाँ पर समता के होने थे। पति को है ये छूट की रख ले चार पत्नियां साथ वाह ! री वाह संसार नरों का, केवल नर के हाथ वर्षों से एक चित्र खड़ा है विष्णु और लक्ष्मी का पैर दबाती पत्नी और देखो आराम पति का। अनुचित है ये कहे नहीँ तो और भला क्या बोलें क्या आँखे हम बन्द करें और साथ इन्हीं के हो लें बुर्का, घूंघट सब महिला पर, पर्दा करें हम ही हम वो भी क्योंकि, मर्दों से नहीँ होता मन पर संयम। क्या ईश्वर भी पक्षपात से जन्मा है तुम सब का या फिर सारा किया धरा ये है मर्दों के मन का अंतिम प्रश्न करो खुद से ही किसके संग खड़ी हो अपने पथ पर हो या पुरषों के पथ पर चलती हो शिव के तीन नयन सोने दो , अपने दो तो खोलो नारी ! आओ बोलो नारी ! आओ बोलो ] आज देश के हुक्मारानों की व्यक्तिगत साजिशों के बीच चलते युद्ध में भी किसी ईरान में स्त्रियाँ अपने अधिकारों के लिए लड़ रही है, बंदिशों के ख़िलाफ़ बोल रही है, थोपे जाने वाले उन सभी बुर्क़ों को और हिजाबों को ख़ाक कर दे रही है, जला दे रही है जिन पर ज़बरदस्ती है सरकारों की। गाँव देहात की स्त्रियाँ पुराने बन्धन तोड़ कर शिक्षा के लिए निकल पड़ी हैं, सुशिक्षित महिलाओं ने घूँघट का परित्याग कर दिया है। शहरों की महिलाएँ बराबरी से कमाने निकल रही हैं, किसी पर आश्रित नहीं होना ठीक समझती हैं, लेकिन इन सबके बीच आज भी बहुत कठिनाई है सामाजिक कुरीतियों को निरंतर तोड़ने की। patriarchy पूरी कोशिश करती रहती है उन्हें क़ैद करने की। आज भी जाड़ू, पौछा, बर्तन को स्त्रियों का काम कहते हैं लोग जबकि अब तक ये बदल जाना चाहिए था। आज भी बहुत लोग पूरी कोशिश करते हैं कि इन शिक्षित महिलाओं को भी शादी के बाद घर बिठा दें, इनका काम छुड़वा दें और बच्चे पालने की ज़िम्मेदारी अकेले पर थोप दें। आज भी किसी अफ़ग़ानिस्तान में पितृसत्ता के दरिंदे औरतों को शिक्षा से कानूनन वंचित करवा देते हैं, हड्डी न टूटने तक पिटाई के आदेश दे देते हैं। इसीलिए इस कविता “नारी आओ बोलो” के माध्यम से मैं नारी चेतना की उसी मशाल को निरंतर जलाए रखना चाहता हूँ जिससे बदलाव धीमा न हो न फ़ीका हो न समाप्त हो। @TablaPoetry Instagram: @bhupendrasinghkhidia @tablapoetry and @ashu_tabla इस Mahila Diwas 2026 पर, महिलाओं की आवाज़ बनो! Share करो, like करो, comment में अपनी स्टोरी बताओ – “तुम्हारी आवाज़ क्या कहती है?” Subscribe for more Hindi Poetry, Nari Shakti Videos & Tabla Beats! #MahilaDiwas #WomensDay2026 #NariShakti #HindiPoetry #TablaPoetry #WomenEmpowerment #ViralPoem #NariAaoBolo #FeminismInHindi #InternationalWomensDay