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प्यार की निशानी - अनु का संकल्प और जेंडे की शर्त! आर्यावर्धन के लापता होने के बाद से अनु की जिंदगी में जैसे अंधेरा छा गया था। उसकी कलाई पर बंधा वो ब्रेसलेट, जो सिर्फ एक गहना नहीं बल्कि आर्या के प्यार और सुरक्षा की निशानी था, आज अनु की एकमात्र उम्मीद बन चुका था। आर्या ने उसे यह ब्रेसलेट देते हुए कहा था, "अनु, जब भी हम मुसीबत में होंगे, यह ब्रेसलेट हमें एक-दूसरे तक पहुंचा देगा।" अनु पिछले कई घंटों से पागलों की तरह उस ब्रेसलेट के बटन को दबा रही थी, उसकी उंगलियां कांप रही थीं, लेकिन दूसरी तरफ से कोई सिग्नल, कोई जवाब नहीं आ रहा था। ब्रेसलेट की लाइट बार-बार ब्लिंक करके बंद हो रही थी, जैसे कह रही हो कि आर्या बहुत बड़ी मुसीबत में है। अनु की आँखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। वो बार-बार खुद से कह रही थी, "प्लीज सर, रिप्लाई करिये... प्लीज एक बार बता दीजिये कि आप ठीक हैं।" तभी वहां जेंडे की एंट्री हुई। जेंडे, जो आर्या का सबसे वफादार सिपाही था, उसकी चेहरे पर भी आज घबराहट साफ़ दिख रही थी। जेंडे ने अनु की तरफ हाथ बढ़ाते हुए कहा, "अनु मैडम, मुझे वो ब्रेसलेट दीजिये। आर्या सर ने उस ब्रेसलेट में एक एडवांस ट्रैकिंग सिस्टम लगाया था। उसी के सहारे हम सर की लोकेशन ट्रेस कर सकते हैं। अब वही हमारी आखिरी उम्मीद है।" अनु ने ब्रेसलेट पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली। उसने अपनी नम आँखों से जेंडे की तरफ देखा और एक दृढ़ निश्चय के साथ कहा, "जेंडे सर, यह ब्रेसलेट आर्या सर ने मुझे दिया था। मैं यह आपको दे दूंगी, लेकिन मेरी एक शर्त है।" जेंडे ने हैरान होकर पूछा, "शर्त? अभी शर्त रखने का वक्त नहीं है अनु मैडम, सर की जान खतरे में है!" अनु ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा, "मैं जानती हूँ, इसीलिए मेरी शर्त यह है कि मैं भी आपके साथ चलूँगी। जहाँ आर्या सर हैं, वहां मुझे भी जाना है। मैं यहाँ हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकती।" जेंडे ने तुरंत मना कर दिया, "नहीं मैडम! वो जगह बहुत खतरनाक हो सकती है। वहां गोलियां चल सकती हैं, जान का खतरा है। मैं आपको वहां ले जाकर सर की मुसीबत और नहीं बढ़ा सकता। आप घर पर रहिये।" लेकिन अनु अपनी जिद पर अड़ी रही। उसने साफ़ कह दिया कि ब्रेसलेट तभी मिलेगा जब उसे साथ ले जाया जाएगा। जेंडे ने अनु की आँखों में वो तड़प देखी जो शायद खुद उसकी आँखों में भी थी। हार मानकर जेंडे ने एक रास्ता निकाला। उसने कहा, "ठीक है, लेकिन मेरी भी एक शर्त है। आप अभी अपने घर जाएंगी और अपने मम्मी-पापा से परमिशन लेकर आएँगी। अगर उन्होंने हाँ कहा, तभी आप मेरे साथ चलेंगी, वरना ब्रेसलेट मुझे देकर आप यहीं रुकेंगी।" जेंडे को लगा था कि अनु के माता-पिता उसे कभी इतनी खतरनाक जगह जाने की इजाजत नहीं देंगे और अनु को यहीं रुकना पड़ेगा। लेकिन अनु ने एक पल भी नहीं गंवाया। वो दौड़ते हुए अपने घर पहुंची। घर का माहौल तनावपूर्ण था। सुब्बू और पद्मा अपनी बेटी की हालत देखकर परेशान थे। अनु ने घर में कदम रखते ही रोते हुए सारी बात बताई। "पापा, आर्या सर को मेरी जरूरत है। अगर आज मैं नहीं गई, तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगी। प्लीज मुझे जाने दीजिये।" सुब्बू ने गुस्से और चिंता में कहा, "पागल हो गई हो अनु? हम अपनी फूल जैसी बेटी को मौत के मुँह में कैसे भेज दें? वो लोग गुंडे हैं, वहां कुछ भी हो सकता है।" पद्मा भी रोने लगी, "नहीं अनु, मैं तुझे कहीं नहीं जाने दूंगी।" लेकिन अनु ने अपने पिता के हाथ पकड़कर कहा, "पापा, आप हमेशा कहते हैं न कि सही का साथ देना चाहिए? आर्या सर ने हमारे लिए क्या कुछ नहीं किया? आज जब उन्हें मेरी जरूरत है, तो मैं पीठ दिखाकर कैसे बैठ जाऊं? यह सिर्फ प्यार की बात नहीं, मेरे फर्ज की बात है। प्लीज पापा, मुझे मत रोकिये।" अनु के शब्दों में इतना दर्द और सच्चाई थी कि सुब्बू का दिल पिघल गया। उसने अपनी बेटी की आँखों में वो हिम्मत देखी जो आज से पहले कभी नहीं देखी थी। सुब्बू ने भारी मन से अनु के सिर पर हाथ रखा और कहा, "जाओ बेटा, अपना फर्ज निभाओ। लेकिन वादा करो, तुम और आर्या सर, दोनों सही सलामत वापस आओगे।" अनु ने अपने माता-पिता के पैर छुए और आंसू पोंछते हुए बाहर निकली। बाहर जेंडे खड़ा था। अनु ने उसे देखा और ब्रेसलेट की तरफ इशारा करते हुए कहा, "चलिए जेंडे सर, परमिशन मिल गई। अब आर्या सर को वापस लाने से हमें कोई नहीं रोक सकता।" जेंडे ने अनु के जज्बे को सलाम किया और दोनों अपनी मंजिल की ओर निकल पड़े—तमाम रुकावटों को चीरकर, अपने प्यार को बचाने के लिए।