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श्रीमद्भगवद्गीता ग्यारहवां अध्याय, जिसे 'विश्वरूप दर्शन योग' कहा जाता है, पूरी गीता के सबसे रोमांचक और भव्य अध्यायों में से एक है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना वह विराट रूप दिखाते हैं, जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड समाया हुआ है। यहाँ इस अध्याय का संक्षिप्त सार और प्रमुख अंश दिए गए हैं: अध्याय 11: विश्वरूप दर्शन योग (सारांश) अर्जुन श्रीकृष्ण के उपदेशों को सुनकर काफी हद तक संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन उनके मन में भगवान के उस ऐश्वर्यशाली रूप को साक्षात् देखने की इच्छा जागती है जिसका वर्णन कृष्ण ने 10वें अध्याय में किया था। 1. अर्जुन की प्रार्थना अर्जुन कहते हैं कि आपके वचनों से मेरा मोह नष्ट हो गया है, लेकिन अब मैं आपके उस रूप को देखना चाहता हूँ जिसमें आप इस चराचर जगत को धारण करते हैं। 2. दिव्य दृष्टि का दान श्रीकृष्ण कहते हैं कि साधारण आँखों से उनका वह रूप देखना संभव नहीं है। इसलिए, वे अर्जुन को 'दिव्य चक्षु' (Divine Vision) प्रदान करते हैं। 3. विश्वरूप का वर्णन संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि भगवान का वह रूप कैसा था: आकाश में हजारों सूर्यों के एक साथ उदय होने से जो प्रकाश होगा, वह भी उस विश्वरूप के तेज के समान नहीं था। अर्जुन ने भगवान के शरीर में एक ही जगह पर स्थित संपूर्ण जगत को देखा। उनके अनंत हाथ, मुख और आँखें थीं, जो हर दिशा में फैली हुई थीं। 4. अर्जुन का भय और स्तुति विश्वरूप की उग्रता और प्रलयकारी रूप (काल रूप) को देखकर अर्जुन डर जाते हैं। वे देखते हैं कि कौरव पक्ष के सभी योद्धा और भीष्म, द्रोण जैसे महारथी भगवान के विकराल मुखों में समा रहे हैं। अर्जुन कांपते हुए हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं और पूछते हैं— "हे उग्र रूप वाले आप कौन हैं?" 5. भगवान का उत्तर: "मैं काल हूँ" श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं: कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो... "मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ 'काल' हूँ। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। तुम्हारे युद्ध न करने पर भी ये प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा जीवित नहीं बचेंगे।" भगवान अर्जुन से कहते हैं कि ये सब तो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं, तुम तो बस निमित्त मात्र (Instrument) बनो। प्रमुख सीख ईश्वर ही सब कुछ है: सृष्टि का सृजन और विनाश दोनों उन्हीं के भीतर हैं। कर्म और फल: युद्ध का परिणाम पहले ही तय है, अर्जुन को केवल अपना कर्तव्य निभाना है। अनन्य भक्ति: अध्याय के अंत में कृष्ण कहते हैं कि मेरा यह चतुर्भुज रूप या विराट रूप न वेदों से, न तप से, न दान से प्राप्त किया जा सकता है; यह केवल अनन्य भक्ति से ही सुलभ है।