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श्रीमद्भगवद्गीता का दसवां अध्याय, जिसे "विभूति योग" कहा जाता है, अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी दिव्य विभूतियों (ऐश्वर्य और शक्तियों) के बारे में विस्तार से बताते हैं ताकि अर्जुन यह समझ सके कि सृष्टि के कण-कण में ईश्वर का वास है। यहाँ इस अध्याय का संक्षिप्त सार और मुख्य अंश हिंदी में दिए गए हैं: अध्याय 10: विभूति योग का सार इस अध्याय में श्रीकृष्ण बताते हैं कि वे ही समस्त जगत के आदि, मध्य और अंत हैं। वे अर्जुन से कहते हैं कि उनकी महिमा का अंत नहीं है, लेकिन वे अपनी मुख्य विभूतियों का वर्णन करेंगे। 1. भगवान की उत्पत्ति और प्रभाव (श्लोक 1-11) श्रीकृष्ण कहते हैं कि न तो देवता और न ही महर्षि उनके उद्भव (जन्म) को जानते हैं, क्योंकि वे ही उन सबके आदि कारण हैं। जो मनुष्य उन्हें अजन्मा और अनादि मानता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। मुख्य विचार: बुद्धि, ज्ञान, क्षमा, सत्य, इंद्रिय निग्रह, सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु—ये सभी भाव भगवान से ही उत्पन्न होते हैं। 2. अर्जुन की प्रार्थना (श्लोक 12-18) अर्जुन श्रीकृष्ण की महिमा सुनकर अभिभूत हो जाते हैं और उन्हें 'परम ब्रह्म' और 'परम धाम' कहकर संबोधित करते हैं। अर्जुन कहते हैं कि वे अब विस्तार से भगवान की उन दिव्य शक्तियों के बारे में जानना चाहते हैं जिनके द्वारा वे इस पूरे संसार को व्याप्त करके स्थित हैं। 3. भगवान की मुख्य विभूतियाँ (श्लोक 19-42) श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि वे हर वस्तु में जो सर्वश्रेष्ठ है, वही हैं। उनके कुछ प्रमुख स्वरूप इस प्रकार हैं: प्राणियों में: मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ। आदित्यों में: मैं विष्णु हूँ। प्रकाशों में: मैं तेजस्वी सूर्य हूँ। वेदों में: मैं सामवेद हूँ। देवताओं में: मैं इंद्र हूँ। रुद्रों में: मैं शंकर हूँ। पर्वतों में: मैं सुमेरु पर्वत हूँ। वृक्षों में: मैं अश्वत्थ (पीपल) का वृक्ष हूँ। ऋषियों में: मैं भृगु हूँ। अक्षरों में: मैं 'अकार' (अ) हूँ। पांडवों में: मैं अर्जुन (धनंजय) हूँ। निष्कर्ष (श्लोक 42) अध्याय के अंत में श्रीकृष्ण एक बहुत ही गहरी बात कहते हैं: "अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन। विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥" अर्थ: "हे अर्जुन! इस बहुत अधिक जानने से तुम्हें क्या प्रयोजन है? मैं तो इस सम्पूर्ण जगत को अपने एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ।" प्रमुख शिक्षा विभूति योग हमें यह सिखाता है कि संसार में जो कुछ भी सुंदर, वैभवशाली, शक्तिशाली या कांतिमान है, वह ईश्वर का ही एक अंश है। यह अध्याय हमें हर जीव और वस्तु में परमात्मा के दर्शन करना सिखाता है।