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भक्ति में कोई मिलावत ना हो सिर्फ प्रेम! || 🙏सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज विचार||#nirankari vichar 🙏धन निरंकार जी🙏 भक्ति का अर्थ निराकार परमात्मा (जो आकार रहित है) से सच्चा प्रेम, अटूट विश्वास और आत्म-समर्पण है। यह ज्ञान के माध्यम से ईश्वर को जानकर, गुरु की शिक्षाओं का पालन करते हुए, निष्काम भाव से की जाने वाली सेवा-सिमरन (याद) है, जिसमें 'मैं' और 'तू' का भेद मिटकर भक्त परमात्मा का ही अंश बन जाता है। • निराकार के प्रति समर्पण: निरंकारी मत में भक्ति किसी मूर्ति या आकार की नहीं, बल्कि निराकार प्रभु की है जो हर जगह मौजूद है। • ब्रह्मज्ञान की भूमिका: सच्चा भक्त पहले गुरु के द्वारा उस निराकार परमात्मा का ज्ञान प्राप्त करता है, फिर भक्ति करता है। • निःस्वार्थ प्रेम (प्रेम लक्षणा भक्ति): यह कोई दिखावा नहीं, बल्कि प्रेम का सौदा है, जिसमें कुछ पाने की इच्छा के बिना केवल ईश्वर के प्रति समर्पण होता है। • सहज अवस्था: जब परमात्मा हर समय, हर सांस में याद रहे, तो वह भक्ति की पराकाष्ठा है। • सच्ची सेवा: भक्त स्वयं को अन्य प्राणियों में भी उसी परमेश्वर को देखता है और सेवा-भाव से जीवन जीता है। 🙏धन निरंकार जी 🙏 Credit :- Sant nirankari mission #nirankari #nirankar #matajivichar #babajivichar #satsang #Maharashtra samagam #atmamanthan #nirankarisatsang #nirankarivichar #latestvichar #sudikshamataji #sudikshajimaharaj #sudikshamataji