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नास्तिक और आस्तिक में क्या फ़र्क है|| 🙏राजपिता रमित जी विचार||#nirankari vichar आस्तिक (Theist) वह है जो ईश्वर या किसी दिव्य शक्ति के अस्तित्व में विश्वास रखता है, जबकि नास्तिक (Atheist) वह है जो इसके अस्तित्व को नहीं मानता; मुख्य अंतर ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करना (आस्तिक) या अस्वीकार करना (नास्तिक) है, हालाँकि दोनों ही "अस्ति" (है) के मूल से निकले हैं, जहाँ आस्तिक 'है' मानता है और नास्तिक 'नहीं है' मानता है, पर नास्तिक ईश्वर के होने का दावा नहीं करता, बल्कि उसके होने के दावे को अस्वीकार करता है, और कई भारतीय दर्शनों में आस्तिक/नास्तिक का अर्थ वेदों की प्रामाणिकता को मानना या न मानना भी होता है। आस्तिक विश्वास: एक सृष्टिकर्ता ईश्वर या उच्च शक्ति में विश्वास करता है जो ब्रह्मांड को चलाता है। दृष्टिकोण: संसार और जीवन के पीछे एक दिव्य योजना देखता है और आध्यात्मिक उन्नति को महत्व देता है। उदाहरण: अक्सर धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पाठ में शामिल होता है, ईश्वर के आदेशों का पालन करता है। नास्तिक विश्वास: ईश्वर या किसी पारलौकिक शक्ति के अस्तित्व को नहीं मानता, मानता है कि सब प्राकृतिक नियमों से होता है। दृष्टिकोण: धर्म, पूजा-पाठ को निरर्थक मानता है; जीवन का उद्देश्य व्यक्तिगत विकास, तर्क और विज्ञान को समझना है। उदाहरण: ईश्वर के होने के दावे को अस्वीकार करता है, यह दावा नहीं करता कि 'ईश्वर नहीं है', बल्कि उसके 'होने' को नहीं मानता। मुख्य अंतर ईश्वर का अस्तित्व: आस्तिक 'है' कहता है (ईश्वर है), नास्तिक 'नहीं है' कहता है (ईश्वर नहीं है, या उसका होने का दावा गलत है)। मार्ग: आस्तिक विधेय (विधेयात्मक) मार्ग से ईश्वरीय शक्ति का अनुभव करता है, जबकि नास्तिक निषेध (नकारात्मक) मार्ग अपनाकर सवाल करता है। भारतीय दर्शन: आस्तिक वेदों को प्रमाण मानता है, जबकि चार्वाक जैसे कुछ नास्तिक दर्शन उन्हें अस्वीकार करते हैं (हालांकि बौद्ध/जैन कर्म को मानते हैं, ईश्वर को नहीं)। निष्कर्ष यह अंतर सिर्फ एक विश्वास का अंतर है; दोनों ही एक परम सत्य की खोज में होते हैं, बस उनके मार्ग और मान्यताएँ अलग होती हैं, जहाँ आस्तिक आस्था पर जोर देता है, वहीं नास्तिक तर्क और विज्ञान पर। Credit :- Sant nirankari mission