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ओम शांति। "संपत्तिवान भव! आयुष्मान भव! पुत्रवान भव! चिरंजीवी भव"! यह कौन दे सकते हैं? "शिवबाबा"!! "शिवबाबा, परमप्रिय परमपिता को याद करने से बाबा (शिवबाबा) की याद और प्यार मिलता है"। "पांच विकारों (काम-क्रोध-मोह-लोभ-अहंकार) रूपी रावण को माया कहा जाता है" । "धन को संपत्ति कहा जाता"। (20/02/1965) गीत- छोड़ भी दे आकाश सिंघासन.. ओम शांति। बच्चों ने ही गीत सुना। "बच्चों ने ही बनाया हुआ है, बच्चों ने ही सुना"। याद करते हैं अपने "परमप्रिय परमपिता" को। "याद" करते हैं, के फिर से ये "माया" की परछाई पड़ गई है, प्रवेश कर गई है। अथवा ये "रावण" का राज हो पड़ा है। सभी दु:खी, दु:खी, दु:खी है। "कहते हैं अपने को, हम भ्रष्टाचारी हैं, पतित हैं, सब कहते हैं"। जरूर इस समय 5000 वर्ष पहले, क्योंकि "कल्प-कल्प बोलते हैं, मैं कल्प-कल्प, कल्प के संगमयुगे आता हूँ"। अभी फिर भी कहते है की "देखो बच्चे, फिर भी कल्प के संगमयुगे आया हुआ हुं"। "बाप कहते हैं बच्चे बच्चे बच्चे बच्चे.. बाप आकर करके अभी आथत देते हैं"। "अभी बेफिक्र रहो बच्चे"। "ये तो मेरा ही पार्ट है दुनिया में, जो बुलाते हैं "बाबा" आओ, आकर के फिर से "राजयोग" सिखलाओ और आए कर करके इस "पतित दुनिया को पावन बनाओ"। वो "बाबा" आए कर करके इस नाटक, ऑर्फ़न लाइफ, निधनके..। "ऑर्फ़न" कहा जाते है, जिनका "मां-बाप" न हो। तो उनका क्या हाल होते हैं? आपस में घर में लड़ते-झगड़ते रहते है। "ये तो है बड़ा घर, बेहद का घर"। इसमें, इस समय में बड़े दु:खी, देखो, ये सभी जो अपन को गुरु कहलाने वाले हैं। ये धर्म के बड़े बड़े, ये आपस में राय कर रहे हैं की इस भारत में, ये जो अशांति हो गई है, लड़ाई-मारामार, सिर्फ भारत में नहीं है बच्चे.. ना। सारी दुनिया में.. "तो फिर जरुर बच्चो को सुख देने के लिए, इस दुःख से पार करने के लिए, व दुःख मिटाने, व इस रावण के राज्य से.. ये परछाई"। "ये रावण राज्य इसको कहा जाता है माया का राज्य"। इससे छुड़ाने के लिए बोलते हैं, ये तो मेरा फर्ज है। देखो, गाते हो न की फिर से आए करके हमको। अभी, किसको कहा फिर से? "ये तो सभी ने बैठ करके बाप को कहा"। "हम सभी का बाप, वर्ल्ड का फादर" वो तो "बाप" है ना बच्ची? "सभी आत्माओं का एक ही बाप"। तो सभी कहते हैं, "हे बेहद के बाबा", "अभी ऊपर से अपना तख़्त छोड़ ब्रह्म महतत्व"। वहां रहते हैं ना बच्ची? ये सभी "आत्माएं ब्रह्म महतत्व में रहते हैं"। "जैसे ये आकाश में रहते हैं ना? तत्व में, ये नाटक होते हैं। फिर "यहां तो जीव-आत्माएं हैं, वो स्थान है आत्माओं का"। ये "भारत" इस समय में "नर्क" है। "नर्क" भी कौन सा बच्चे? "रौरव नर्क"। वो एक यहां शास्त्र हैं ना बच्चे? "गरुड़ पुराण", उनमें ये कथाएं हैं। परंतु रौरव नर्क कोई नदी-वदी नहीं है। "देखो, ये विषय सागर, यानी विषय में गोता खाते हैं सभी"। और इस समय में, जो भी मनुष्य मात्र इस विषय सागर में, ना? "दुनिया है, कोई नदी-वदी नहीं है"। सभी एक-दो को काटते-मारते दुखी करते ही रहते हैं। "बच्चे बाप को, पति स्त्री को, स्त्री पति को, भाई भाई को"। देखो, कितने हैं दुखी यहां? तो क्या होता है? "बाप आकर के समझाते हैं की बच्चे ये ड्रामा हुआ है ना"? "बना हुआ है सुख और दुःख का"। ऐसे नहीं कहा, अभी-अभी स्वर्ग है सुख है, अभी-अभी नर्क है, स्वर्ग है या जिसके पास बहुत धन है वो स्वर्ग में है जिसके पास नहीं सो नहीं। नहीं। "सभी धनवान भी दुखी है"। क्योंकि "दुःख जरूर उठाते हैं, बीमारी है सिमारी है कोई मरा, कोई रोया, कोई पीटा, कोई ने गोली मारी"। "देखो, तो ये सारा क्वेश्चन है की सारी ये जो दुनिया है दुखी है"। क्यों दुखी है? "बाप आकर के कहते है- तुम नास्तिक बन गए हो"। तुम्हारा जो धनी "मात-पिता" जिसके लिए गाते भी हो, तुम "मात-पिता हम बालक तेरे तुम्हारी कृपा ते.."। क्योंकि "जब फादर है, तो मदर भी है न बच्चे"। तुम्हारी कृपा ते सुख घनेरे.. बस गायन मिसल, बाकी मालूम नहीं है इनको की मात-पिता कौन हैं? किसको याद करें? किसको भी पता भी नही है। "शिवलिंग" के ऊपर जाएंगा, त्वमेव मातास्च पिता..। "लक्ष्मी- नारायण" के पास जाएंगा त्वमेव मातास्च पिता, छोटे बच्चे राधे-कृष्ण के पास जाएंगा तभी भी कहेंगे त्वमेव मातास्च पिता, पीछे पिछाड़ी में बैठकर के त्वमेव मातास्च पिता बंधुस्च सखा। तो बरोबर, बाप बैठ करके समझाते हैं बच्चे ये जो भी तुम्हारे आदि लौकिक में भिन्न-भिन्न के मात-पिता भाई वगैरे-वगैरे गुरु गोसाई, यह सब है "निधनके, ऑर्फन लाइफ" जो बाप को नहीं जानते हैं। और कहते भी आते थे, "शिवबाबा" हम नहीं जानते। "रचता को अर्थात बाप" को, उसकी इस रचना को, यानी ये मार काट, ये सृष्टि का चक्र, "माया" का चक्र नहीं। "माया कहा जाता है रावण को, पांच विकारों रूपी रावण को माया कहा जाता है"। "धन को संपत्ति कहा जाता"। ऐसे नहीं कहना है की इसके पास बहुत "माया" है, यह तो उनको और ही उल्टा कर दिया। नहीं, उनके पास बहुत संपत्ति है। "माया है ही रावण, पांच विकारों को माया कहा जाता है और धन को संपत्ति"। "संपत्तिवान भव!, आयुष्मान भव! ऐसे कहते हैं ना? पुत्रवान भव! चिरंजीवी भव"! तो देखो, यह कौन दे सकते हैं आशीर्वाद? यह तो बाप (शिवबाबा) को देना है और सबको देना है ना? "कोई गुरु थोड़ी है जो खाली फॉलोअर्स को देंगा"। नहीं। ऐसा कोई गरु नहीं है क्योंकि ये जो गुरु है ना? वह है "भक्ति मार्ग वाले गुरु"। "ज्ञान सागर तो एक (शिवबाबा) ही है ना बच्चे? जिसके लिए देखो गीत कितना अच्छा है"? सभी गाते रहते हैं। देखो, जब भी "गीता" सुनाते हैं ना? तभी बस, "गीता" सुनाके कह देते हैं "कृष्ण भगवानुवाच"। "श्रीकृष्ण को भगवान"? "भगवान को, ऊपर वाले "शिवबाबा" को बुलाते हो की रूप बदल कर के आओ"। "रूप तो हम और तुम, ये दादा हैं, ये सभी ये तो बदलते हैं ना? (20/02/1965)