У нас вы можете посмотреть бесплатно मुनि सुतीक्ष्ण की हरि भक्ति। महर्षि अगस्त्य की महिमा का बखान | Ramayan Katha или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
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उर्मिला का त्याग अपूर्व है। वो प्रतिदिन लक्ष्मण की याद में देवी मन्दिर में दीप जलाती हैं। मानों यह दीप उनके मन की विरह अग्नि से जलता है। राम लक्ष्मण सीता दण्डकारण्य में पहुँचते हैं। यहाँ उन्हें हड्डियों का ढेर दिखता है। वन में असुर ऋषियों मुनियों का भक्षण कर उनकी हड्डियाँ फेंक देते हैं, उससे यह ढेर लगा है। राम ऋषियों को विश्वास दिलाते हैं कि वे और लक्ष्मण दण्डकारण्य को असुरी शक्तियों से मुक्त करायेंगे। वे दण्डकारण्य में स्थित साधु आश्रमों में घूम घूमकर वहाँ आक्रमण करने वाले असुरों का वध करने लगते हैं। उधर माता कौशल्या के दस साल राजमहल के झरोखे से राम का रास्ता देखते देखते बीत जाते हैं। एक दिन नदी के तट पर राम अनुज लक्ष्मण से कहते हैं कि आगे की यात्रा में उन्हें बहुत सिद्ध ऋषि मुनि मिलने वाले हैं और उनसे काफी कुछ सीखने को मिलेगा। ऐसा ही होता है। वे वन पथ पर पड़ने वाले हर आश्रम में साधु वचन सुनते हैं। उनसे जीवन दर्शन की अनेक गूढ़ बातें सीखते हैं। राम लक्ष्मण सीता महर्षि अगस्त्य के वनक्षेत्र में पहुँचते हैं। यहाँ एक कुटिया में मुनि सुतीक्ष्ण ध्यान लगाये बैठे हैं। राम उनके हृदय में विराजमान भगवान विष्णु की छवि देख लेते हैं। राम सुतीक्ष्ण जी को प्रणाम करते हैं लेकिन सुतीक्ष्ण जी जान लेते हैं कि स्वयं भगवान विष्णु मानव रूप में उनके समक्ष खड़े हैं। वे भक्तिभाव से अपने प्रभु के चरणों में झुक जाते हैं। राम उनसे अगस्त्य महर्षि से मिलने की इच्छा व्यक्त करते हैं। सुतीक्ष्ण जी उन्हें महर्षि के आश्रम को ले जाते हैं। महर्षि अगस्त्य का आभा पुंज उनकी कुटिया के बाहर से परिलक्षित होता है। सीता इसे देखकर अचम्भित हो जाती हैं। तब राम उन्हें महर्षि अगस्त्य की आध्यात्मिक शक्ति का बखान करते हुए बताते हैं कि एक बार तमाम असुर समुद्र के भीतर छिप जाते हैं तब देवराज इन्द्र के कहने पर महर्षि अगस्त्य ने पूरे समुद्र को अपनी अंजलि में भरकर पी लिया था और इन्द्र वहाँ छिपे असुरों पर प्रहार कर उन्हें मार सके थे। राम बताते हैं कि एक बार विध्यांचल पर्वत ने दम्भपूर्वक अपना आकार बड़ा करके सूर्य का मार्ग रोक दिया था तब महर्षि अगस्त्य ने विध्यांचल को अपने चरणों से दबा दिया था। इसी कारण उनका नाम अगत्स्य पड़ा था। राम आगे बताते हैं कि भगवान शिव का विवाह देखने के लिये सभी शक्तियां और जीवराशियां उत्तर दिशा में आ गयी थीं। इससे धरती का सन्तुलन बिगड़ गया था। तब शिव जी के कहने पर महर्षि अगस्त्य विध्यांचल पार करके दक्षिण में चले गये थे। अकेले उनके वहाँ जाने से धरती का सन्तुलन पुनर्स्थापित हो गया था। इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने महर्षि अगस्त्य को तमिल भाषा का ज्ञान दिया था। अगस्त्य ने तमिल की व्याकरण तैयार कर इसे विश्व की श्रेष्ठ भाषा बनाया। अगस्त्य ही ब्रह्मा को प्रसन्न कर कावेरी नदी को ब्रह्मलोक से दक्षिण भारत की धरती पर लेकर आये थे। तब से कावेरी धरती पर गंगा के समान पूज्यनीय नदी के रूप में बह रही हैं। सुतीक्ष्ण मुनि अपने गुरुदेव के बारे में राम के व्याख्यान का समर्थन करते हैं। भारत की अमर कहानियाँ में आपको मिलती हैं ऐसी कथाएँ जो न केवल अनोखी हैं, बल्कि हमारी संस्कृति की अमूल्य धरोहर भी हैं। ये कहानियाँ शाश्वत हैं क्योंकि ये हमारे मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। #vikrambetal #rajavikramaditya #ramayanstories #shreekrishnaleela #krishnakatha #gangaavataran #mahalakshmikatha #hindumytho #bhaktibhavna #naitikkahani #devikatha #dharmaauradharma #mythostory #epiclegends #ramkatha #krishnabhakti #lokkatha #bharatkikahaniyan #bhaktistories #hindistoryshorts