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D# तानपुरा और तबला के साथ अलंकार अभ्यास भारतीय शास्त्रीय संगीत में अलंकार अभ्यास को स्वर-साधना की रीढ़ कहा जाता है। अलंकारों के नियमित अभ्यास से गायन, वादन और स्वर-ज्ञान—तीनों में स्थिरता, शुद्धता और सौंदर्य आता है। जब यह अभ्यास D# (रे#) स्केल पर तानपुरा और तबला के साथ किया जाता है, तो इसका प्रभाव और भी गहरा हो जाता है। यह अभ्यास न केवल तकनीकी दक्षता बढ़ाता है, बल्कि लय, ताल और सुर के बीच संतुलन भी सिखाता है। D# स्केल का परिचय D# स्केल (रे# स्केल) आधुनिक समय में विशेष रूप से पुरुष गायकों और मध्यम से ऊँची पिच में गाने वालों के लिए उपयोगी मानी जाती है। यह स्केल आवाज़ को न अधिक भारी बनाती है और न ही अत्यधिक तीखी। D# स्केल में अभ्यास करने से: स्वर स्पष्ट और चमकदार बनते हैं गले पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता तानों और मींड में आसानी होती है स्टेज पर प्रस्तुति संतुलित रहती है तानपुरा का महत्व (D# में) तानपुरा संगीत का आधार स्तंभ है। D# स्केल में तानपुरा लगाने से स्वर को सही दिशा और स्थिर आधार मिलता है। D# तानपुरा की सामान्य सेटिंग सा (D#) – प – सा – सा या सा – म – सा – सा (यदि पंचम प्रयोग न हो) तानपुरा की निरंतर ध्वनि से कान स्वतः ही शुद्ध स्वर पहचानने लगता है। इससे अलंकार अभ्यास के दौरान स्वर फिसलने की संभावना कम हो जाती है। तबला का महत्व अलंकार अभ्यास में अक्सर विद्यार्थी केवल तानपुरा के साथ अलंकार करते हैं, लेकिन तबला जोड़ने से अभ्यास में अनुशासन और लयबोध आता है। उपयुक्त ताल तीनताल (16 मात्रा) – सबसे उत्तम केहरवा (8 मात्रा) – शुरुआती अभ्यास के लिए दादरा (6 मात्रा) – मध्यम गति के लिए तबले के साथ अभ्यास करने से: लय में गाने की आदत बनती है सम पर ठहराव आता है तानों में संतुलन रहता है अलंकार क्या हैं? अलंकार स्वर-संयोजन के वे विशेष क्रम हैं जिनसे स्वर-शुद्धि, गति और फुर्ती विकसित होती है। ये अभ्यास स्वर-साधना का व्याकरण माने जाते हैं। D# स्केल में प्रमुख अलंकार अभ्यास नीचे कुछ प्रमुख अलंकार दिए जा रहे हैं, जिन्हें D# तानपुरा और तबला के साथ अभ्यास करना अत्यंत लाभकारी है। 1. सरल आरोही अलंकार सा रे ग म प ध नि सां सां नि ध प म ग रे सा D# स्केल में इसे रे# को सा मानकर गाएँ। धीमी लय में तीनताल के साथ अभ्यास करें। लाभ: स्वर पहचान मजबूत होती है शुरुआती विद्यार्थियों के लिए सर्वोत्तम 2. द्विगुण अलंकार सा सा रे रे ग ग म म प प ध ध नि नि सां सां इस अलंकार में प्रत्येक स्वर दो बार आता है। लाभ: स्वर पर पकड़ मजबूत होती है गले की स्थिरता बढ़ती है 3. त्रिगुण अलंकार सा सा सा रे रे रे ग ग ग म म म इसे पहले बिना तबला, फिर तबला जोड़कर करें। लाभ: आवाज़ में ठहराव आता है लंबी तानों में मदद मिलती है 4. उलटे-सीधे अलंकार सा रे ग म | म ग रे सा रे ग म प | प म ग रे लाभ: स्वर पलटने की क्षमता बढ़ती है रागों में चलन समझने में सहायता 5. कूद वाले अलंकार सा ग रे म | ग प म ध लाभ: आवाज़ में फुर्ती आती है तेज तानों के लिए उपयोगी तबला के साथ अभ्यास की विधि पहले तानपुरा चालू करें (D#) 2–3 मिनट केवल सा पर बैठें तबला को धीमी लय (विलंबित) में चलाएँ अलंकार को पहले बोलकर, फिर गाकर अभ्यास करें हर अलंकार को कम से कम 5–7 बार दोहराएँ अभ्यास का सही क्रम तानपुरा सुनना सा-साधना सरल अलंकार मध्यम गति अलंकार तबला के साथ अभ्यास अंत में एक आलाप या स्वर-लय अभ्यास नियमित अभ्यास से होने वाले लाभ स्वर शुद्ध और स्थिर होते हैं आवाज़ में दम और मिठास आती है ताल में गाने की आदत बनती है मंच भय कम होता है राग अभ्यास आसान हो जाता है विद्यार्थियों के लिए विशेष सुझाव रोज़ कम से कम 30–45 मिनट अभ्यास करें मोबाइल/ऐप से सही D# तानपुरा ही प्रयोग करें जल्दबाज़ी में तेज़ लय न अपनाएँ गला खराब हो तो अभ्यास रोक दें गुरु के निर्देश को प्राथमिकता दें निष्कर्ष D# तानपुरा और तबला के साथ अलंकार अभ्यास संगीत साधना को एक नई ऊँचाई देता है। यह अभ्यास न केवल तकनीकी दृष्टि से उपयोगी है, बल्कि साधक के मन और आत्मा को भी संगीत से जोड़ता है। नियमित, धैर्यपूर्ण और सही विधि से किया गया अलंकार अभ्यास हर विद्यार्थी को एक सशक्त गायक या वादक बना सकता है। #हिंदी #भारत #प्रेरणा #सकारात्मक #जीवन #सोच #सफलता #अनुभव #ज्ञान #आजकाविचार