У нас вы можете посмотреть бесплатно "रत्नकरण्ड श्रावकाचार"- समंतभद्राचार्य कृत- व्या.-21 प्रो.अनेकांत जैन, अहिंसास्थल, नईदिल्ली-22.01.26 или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
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आज के स्वाध्याय का मंगलाचरण और जिनवाणी स्तुति डॉ अनेकांत जी की सुपुत्री अनुप्रेक्षा जैन (छात्रा श्रमण संस्कृति संस्थान, सांगानेर), द्वारा किया गया। स्वाध्याय का विषय -श्लोक -24 विशेष भावार्थ , रत्नकरण्ड श्रावकाचार का श्लोक 24 पाषण्डि मूढ़ता (मिथ्यादर्शन की एक अवस्था) का वर्णन करता है, जो कहता है कि पाषण्डियों (बाह्य मतों) की प्रशंसा करना या उनका सम्मान करना पाषण्डिमोह (पाषण्डियों के प्रति मोह) है, जिसे जानना चाहिए (सम्यग्दर्शन के लिए त्याज्य है); इसका अर्थ है कि झूठे मार्ग का अनुसरण करने वालों को महिमामंडित करना स्वयं मूढ़ता है और इसे सम्यग्दर्शन प्राप्ति के मार्ग में बाधक समझना चाहिए। श्लोक: सग्रन्थारम्भहिंसानां संसारावर्तवर्तिनाम् पाषण्डिनां पुरस्कारो ज्ञेयं पाषण्डिमोहनम् ॥24॥ अर्थ: पाषण्डिनाम् (पाषण्डियों का): जो सच्चे जैन धर्म से भिन्न मतों (पाखंडी मतों) का पालन करते हैं। पुरस्कारः (पुरस्कार/सम्मान): उनकी प्रशंसा करना, उन्हें आगे बढ़ाना, या उन्हें महत्व देना। ज्ञेयम् (जानना चाहिए): इसे सम्यग्दर्शन के संदर्भ में जानना और पहचानना चाहिए। पाषण्डिमोहनम् (पाषण्डिमोह): पाषण्डियों के प्रति मोह या उनकी बातों में आ जाना। जो दासी-दास आदि परिग्रह, खेती आदि आरम्भ और अनेक प्रकार की प्राणिवधरूप हिंसा से सहित हैं तथा जो संसार-भ्रमण कराने वाले , ऐसे साधुओं की प्रशंसा करना, उन्हें धार्मिक कार्यों में अग्रसर करना पाखण्ड मूढ़ता जाननी चाहिये। पाखण्डी का अर्थ मिथ्या वेषधारी गुरु होता है ।मूढ़ता अविवेक को कहते हैं। इस प्रकार गुरु के विषय में जो अविवेक है, वह पाखण्ड मूढ़ता है । उपर्युक्त तीन मूढ़ताओं से रहित सम्यग्दर्शन ही संसार के उच्छेदन का कारण है। जैसा कि आठ मदों से रहित सम्यग्दर्शन संसार के नाश का कारण है । भावार्थ: यह श्लोक सम्यग्दर्शन के अंगों (आठ अंग) में से एक, 'अमूढ़दृष्टि' (जो झूठे सिद्धांतों और पाखंडी लोगों से मोहित न हो) के संदर्भ में है। यह बताता है कि हमें अन्य मतों के लोगों का आदर या प्रशंसा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा करना स्वयं मिथ्यात्व (पाषण्डिमोह) का कारण बनता है और यह सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के मार्ग में एक बाधा है।