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#music #vedantsong #hindisong Lyrics [Intro] मैं निर्विकार, मैं अविनाशी, चैतन्य रूप अनूप हूँ देह बदलती प्रतिक्षण देखो, मैं साक्षी स्वरूप हूँ। अहं विकारहीन: सत्य है, देह नित्य विकारवान कैसे जड़ यह नश्वर काया, हो सकती श्रीमान? [Verse 1] पंचभूत का यह संघात, जन्म-मरण का खेल यहाँ बाल्य, युवा और जरा अवस्था, टिकता है सुख-मेल कहाँ? भूख-प्यास और रोग-शोक सब, इस देह के धर्म हैं मैं ज्ञाता, मैं दृष्टा इनका, मुक्त सभी ये कर्म हैं। [Chorus] मैं निर्विकार, मैं अविनाशी, चैतन्य रूप अनूप हूँ देह बदलती प्रतिक्षण देखो, मैं साक्षी स्वरूप हूँ। अहं विकारहीन: सत्य है, देह नित्य विकारवान कैसे जड़ यह नश्वर काया, हो सकती श्रीमान? [Verse 2] विचार, भाव और स्मृतियाँ, मन की लहरें आती हैं पर जो इनको जान रहा, उसकी ज्योति न जाती है। "मेरा तन" और "मेरा मन", जो कहता हर घड़ी विवेक ज्ञाता-ज्ञेय का भेद स्पष्ट है, मैं हूँ केवल एक। [Chorus] मैं निर्विकार, मैं अविनाशी, चैतन्य रूप अनूप हूँ देह बदलती प्रतिक्षण देखो, मैं साक्षी स्वरूप हूँ। अहं विकारहीन: सत्य है, देह नित्य विकारवान कैसे जड़ यह नश्वर काया, हो सकती श्रीमान? [Verse 3] देह नहीं मैं, आत्मा निर्मल, यही अटल निष्कर्ष है अध्यास मिटे जब देह-बुद्धि का, तब मिलता उत्कर्ष है। बदल रहा जो वह मैं कैसे? मैं तो अचल अपार हूँ शांत, शुद्ध, शिव, सच्चिदानंद, मैं ही निराकार हूँ। [Chorus] मैं निर्विकार, मैं अविनाशी, चैतन्य रूप अनूप हूँ देह बदलती प्रतिक्षण देखो, मैं साक्षी स्वरूप हूँ। अहं विकारहीन: सत्य है, देह नित्य विकारवान कैसे जड़ यह नश्वर काया, हो सकती श्रीमान?