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“आज वृहदारण्यक उपनिषद का वह संवाद है, जहाँ पति-पत्नी की बात से शुरू होकर पूरा अस्तित्व सामने आ खड़ा होता है। यह याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद है — यह दर्शन नहीं, जीवन का एक्स-रे है।” “आज का प्रश्न बहुत सीधा है — आत्मा क्या है? और याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को क्या उत्तर दिया।” “पन्द्रह मन्त्र हैं, और हर मन्त्र एक-एक भ्रम तोड़ देता है।” “अगर धन से अमरत्व नहीं मिलता, तो हम दिन-रात किस भ्रम के पीछे भाग रहे हैं?” “जिसे हम सबसे ज़्यादा चाहते हैं, क्या हम उसे सच में चाहते हैं या अपने सुख को? “जो देखने वाला है, वह स्वयं क्यों नहीं दिखता?” “उपनिषद कहता है — तुम किसी से प्रेम नहीं करते, तुम अपने भीतर की आत्मा को पहचानने का प्रयास करते हो। पर गलती यह हो जाती है कि आत्मा की जगह हम व्यक्ति को पकड़ लेते हैं।” “मैत्रेयी को ज्ञान इसलिए मिला क्योंकि उसने यह नहीं पूछा कि ‘मुझे क्या मिलेगा?’ उसने पूछा — ‘क्या इससे मैं अमर हो जाऊँगी?’ और याज्ञवल्क्य ने ईमानदारी से कह दिया — न धन से, न संबंध से, केवल आत्मबोध से।” “जिस दिन आत्मा समझ में आ जाए, उस दिन मृत्यु भी समाचार बनकर रह जाती है।” #upnishad #veda #gyan #nareshchandra #simplicity #knowledge