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अल्बर्ट आइंस्टीन के बारे में यह एक बहुत बड़ा भ्रम फैला हुआ है कि वे बचपन में पढ़ाई में बहुत कमजोर थे या गणित में फेल हो गए थे। सच तो यह है कि उनका पढ़ाई से रिश्ता बेहद गहरा, लेकिन थोड़ा 'बागी' (Rebellious) था। आइए आइंस्टीन की शिक्षा से जुड़े असली सच को समझते हैं: 1. "गणित में फेल होने" की अफवाह का सच यह सबसे बड़ा झूठ है। आइंस्टीन ने खुद एक बार हंसते हुए कहा था— "मैं 15 साल की उम्र से पहले ही डिफरेंशियल और इंटीग्रल कैलकुलस में महारत हासिल कर चुका था।" सच: दरअसल, उनके स्कूल (म्यूनिख) में ग्रेडिंग सिस्टम बदल गया था। वहां '1' सबसे अच्छा और '6' सबसे खराब ग्रेड था, लेकिन बाद में इसे उल्टा कर दिया गया। लोगों ने उनके पुराने रिकॉर्ड्स देखे और उन्हें लगा कि '1' का मतलब फेल होना है, जबकि वह 'टॉप ग्रेड' था। 2. रटने वाली शिक्षा के विरोधी आइंस्टीन का रिश्ता 'स्कूलिंग' से खराब था, 'शिक्षा' से नहीं। उन्हें वह सिस्टम पसंद नहीं था जहाँ बच्चों को सैनिकों की तरह अनुशासन में रखा जाए और तथ्यों को रटने पर जोर दिया जाए। उनका मानना था: "शिक्षा वह है जो तब भी याद रहती है जब आप स्कूल में सीखी गई हर चीज़ भूल जाते हैं।" 3. पहले प्रयास में कॉलेज एंट्रेंस में विफलता जब आइंस्टीन 16 साल के थे, तो उन्होंने 'ज्यूरिख पॉलिटेक्निक' की प्रवेश परीक्षा दी। वे गणित और विज्ञान में तो अद्भुत रहे, लेकिन भाषा, जीव विज्ञान और इतिहास में फेल हो गए। सीख: उन्होंने हार नहीं मानी, अपनी कमियों पर काम किया और अगले साल प्रवेश लिया। यह दिखाता है कि एक जीनियस भी हर विषय में शुरुआत से परफेक्ट नहीं होता। 4. कल्पना (Imagination) बनाम ज्ञान आइंस्टीन के लिए पढ़ाई का मतलब किताबों के पन्ने पलटना नहीं, बल्कि 'थॉट एक्सपेरिमेंट्स' (Thought Experiments) करना था। 16 साल की उम्र में ही उन्होंने कल्पना की थी कि "यदि मैं प्रकाश की किरण के साथ दौड़ूँ तो क्या होगा?" इसी 'पढ़ाई' ने आगे चलकर थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी (E=mc 2 ) को जन्म दिया। आइंस्टीन का 'लर्निंग मॉडल' पहलू आइंस्टीन का दृष्टिकोण शिक्षक वे उन शिक्षकों का सम्मान करते थे जो सवाल पूछने की आजादी देते थे। किताबें वे केवल संदर्भ (Reference) के लिए थी, असली ज्ञान सोचने में था। जिज्ञासा उन्होंने कहा था, "मुझमें कोई खास टैलेंट नहीं है, बस मैं जुनून की हद तक जिज्ञासु (Curious) हूँ।" 5. पेटेंट ऑफिस की 'असली पढ़ाई' यूनिवर्सिटी के बाद उन्हें कहीं प्रोफेसर की नौकरी नहीं मिली। उन्होंने एक पेटेंट ऑफिस में क्लर्क की नौकरी की। लोग इसे उनकी विफलता मानते थे, लेकिन आइंस्टीन ने वहां बैठकर मशीनों के डिजाइनों को समझा और खाली समय में भौतिकी के सबसे कठिन समीकरण सुलझाए। 1905 में उन्होंने 4 ऐसे रिसर्च पेपर लिखे जिन्होंने विज्ञान की दुनिया बदल दी। निष्कर्ष: आइंस्टीन का पढ़ाई से रिश्ता 'क्यों' और 'कैसे' का था। वे उन चीजों को नहीं पढ़ते थे जो परीक्षा में आती थीं, बल्कि उन्हें पढ़ते थे जो ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाती थीं।