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विस्तृत सारांश: [00:02] - [05:00] • छठी कारिका की व्याख्या: वक्ता (Presenter) समझाते हैं कि श्री हरिराय जी वर्णन कर रहे हैं कि ठाकुर जी ने गले में सोने के कृत्रिम मनकों (मोतियों) से बनी एक सुंदर और मोटी माला पहनी है। इसके साथ ही उन्होंने गुंजा (घुंघची) की एक बड़ी माला धारण की है, जो उनकी दोनों जांघों (उरू) के मध्य भाग तक सुशोभित हो रही है। • गुंजा और मोहन माला: वक्ता बताते हैं कि यह गुंजा माला श्वेत रंग की और सुंदर गूंथी हुई है, जिसे 'चतुर्थ स्वामिनी जी' (श्री चंद्रावली जी) के यूथपति के भाव से पहना गया है। इसके अलावा एक 'मोहन माला' है जो कंठ से लेकर घुटनों तक लंबी है। • शृंगार का भाव: वक्ता स्पष्ट करते हैं कि मूल रूप से (वस्तुतः) ठाकुर जी वन के पुष्प और गुंजा आदि प्राकृतिक शृंगार (गोप वेश) ही नित्य धारण करते हैं। बाद में भक्तों ने अपनी उत्तम वस्तुओं को प्रभु को समर्पित करने की भावना से सोने, रत्न और मीनाकारी के शृंगार बढ़ाए हैं। • अनिवार्यता: गुंजामाला ठाकुर जी के शृंगार का अनिवार्य अंग है क्योंकि यह ब्रज लीला का प्रतीक है। चाहे कितना भी बड़ा उत्सव हो, गुंजामाला के बिना शृंगार अधूरे माने जाते हैं। यदि श्रीअंग (विग्रह) पर जगह न हो, तो इसे गादी पर धराया जाता है। लाल गुंजा श्री स्वामिनी जी (राधा जी) के भाव से और श्वेत गुंजा श्री चंद्रावली जी के भाव से धरायी जाती है। • प्रश्नोत्तरी (ऋतु अनुसार गुंजा): • प्रश्न: लाल और सफेद गुंजा माला किस मौसम में धरायी जाती है? • उत्तर: वक्ता बताते हैं कि शीतकाल (प्रबोधिनी एकादशी से वसंत पंचमी तक) में केवल लाल गुंजा धराते हैं क्योंकि गहरे रंग आँखों को अच्छे लगते हैं। उष्ण काल (गर्मी) में लाल रंग आँखों को गर्म लगता है, इसलिए केवल श्वेत गुंजा (चंद्रावली जी के भाव से) धराते हैं। अक्षय तृतीया से कुसुंभी छठ तक लाल रंग का निषेध रहता है। • प्रश्न: क्या श्याम (काली) गुंजा भी होती है? • उत्तर: जब गुंजा बहुत पक जाती है तो उसका रंग गहरा मेरून या श्याम हो जाता है। 'श्याम घटा' के दिन ऐसी श्याम गुंजा माला धराने का क्रम है। • सातवीं कारिका की व्याख्या: वक्ता वर्णन करते हैं कि ठाकुर जी ने अपने दोनों हाथों में अनेक रत्नों से जड़े हुए कंगन (कंकण) पहने हैं। उनकी भुजाओं के बीच में सोने और रत्नों से बने विशाल और सुंदर बाजूबंद (अंगद) सुशोभित हैं। • श्रीहस्त के आभूषण: नित्य नियम में ठाकुर जी मोती की 'पोहंची' (कलाई का आभूषण) धरते हैं जो सफेद, लाल, हरी, फिरोजी या मूंगा (केसरी/पीला) रंग की होती है। भारी उत्सवों या खेल के दिनों में सोने की या दोहरी पोहंची धराने का क्रम है। [10:00] - [15:00] • आठवीं कारिका की व्याख्या: वक्ता बताते हैं कि ठाकुर जी अनेक प्रकार के पुष्पों और तुलसी से गूंथी हुई सुंदर 'वनमाला' से सुशोभित हैं। उन्होंने कमर पर विचित्र रंगों वाला कटि वस्त्र (काछनी) धारण किया है। यह काछनी पचरंग (पाँच रंगों की) होती है जो सभी ब्रजभक्तों के भाव को दर्शाती है। यदि अवकाश (जगह) हो तो वे तीन या चार रंगों की काछनी धरते हैं, जो चार यूथपतियों (श्री यमुना जी, श्री राधा जी, श्री चंद्रावली जी और श्री ललिता जी) के भाव से होती है। • पुष्प माला का नियम: वक्ता कहते हैं कि गुंजा माला की तरह ही, उपलब्ध फूलों की माला शृंगार के बाद धरायी जाती है। जिन फूलों का शास्त्र में निषेध न हो, उन सभी रंग-बिरंगे फूलों का उपयोग ब्रजभक्तों के भाव से किया जाता है। • प्रश्नोत्तरी (रत्नों का उपयोग): • प्रश्न: गोमेद, पुखराज आदि रत्नों का उपयोग कब होता है? • उत्तर: नित्य शृंगार में लाल, हरे और सफेद रत्नों का ही क्रम है। सावन मास में हिंडोला उत्सव के दौरान और राखी तक गोमेद (पीला), पुखराज और फिरोजा का उपयोग किया जाता है। उत्सवों में कुछ 'नया' और 'विशेष' करने की भावना से यह बदलाव किया जाता है। • नौवीं कारिका की व्याख्या: वक्ता समझाते हैं कि ठाकुर जी के चरणों के नख रूपी चंद्रमा (नखचंद्र) के प्रकाश ने तीनों लोकों (आकाश, पाताल, भूलोक) को प्रकाशित कर दिया है। यह प्रकाश केवल उन भक्तों के हृदय में होता है जिन्होंने ठाकुर जी के चरणों का आश्रय लिया है। • त्रिभंगी स्वरूप: यह ललित त्रिभंगी स्वरूप वृंदावन में स्थित है और इसका अनुभव केवल ब्रजभक्तों (राजसी, तामसी, सात्विकी) को है। • पीतांबर का भाव: ठाकुर जी ने जो पीतांबर (उत्तरीय वस्त्र) धारण किया है, वह श्री स्वामिनी जी (राधा जी) की ओढ़नी/उत्तरीय के भाव से पहना है। इस वस्त्र के दोनों छोर मंद और सुगंधित वायु से हिलते हुए (चलायमान) अत्यंत सुंदर लग रहे हैं। • वेणुनाद: जब ठाकुर जी वेणुनाद (बांसुरी वादन) करते हैं और उनकी उंगलियां चलती हैं, तो नखचंद्र का प्रकाश चंद्रमा की कलाओं की तरह घटता-बढ़ता है और भक्तों के हृदय को प्रकाशित करता है। • दसवीं कारिका की व्याख्या: वक्ता बताते हैं कि ठाकुर जी की कमर में बंधी करधनी (किंकणी) का शब्द (रव) ब्रजभक्तों को उनकी लीलाओं (रमण आदि) के भावों की सूचना दे रहा है। उनके दोनों चरण कमलों की चाल अत्यंत सुंदर है और वे सोने में जड़े मणियों युक्त नूपुर (पायल) से सुशोभित हैं। • नूपुर का प्रयोजन: ठाकुर जी नित्य नूपुर धारण करते हैं (ठाड़े स्वरूप शयन में भी)। बजने वाले (घुंघरू वाले) नूपुर नित्य धराये जाते हैं ताकि उनके चरणों की ध्वनि ब्रजभक्तों को सुनाई दे और उन्हें लीला में आमंत्रित कर सके। • प्रश्न: "स्वामिनी जी के उत्तरीय भाव" का क्या अर्थ है? • उत्तर: इसका अर्थ है कि जिस रंग की चोली या ओढ़नी श्री स्वामिनी जी ने पहनी है, उसी रंग और भाव से मेल खाता हुआ (Matching) पीतांबर/पटका ठाकुर जी धारण करते हैं। • प्रश्न: क्या स्वामिनी जी पूरा श्याम (काला) रंग पहनती हैं? • उत्तर: नहीं, सौभाग्यवती होने के कारण वे पूरा काला या नीला रंग नहीं पहनतीं (केवल 'चिया' वस्त्र हो सकता है)। वे प्रायः पीला, गुलाबी, लाल, हरा, केसरी आदि रंग पहनती हैं, इसलिए ठाकुर जी का पटका भी उन्हीं रंगों का होता है।