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लाडू बारोट से स्वामी ब्रह्मानंद तक का सफर लाडू बारोट सौराष्ट्र के एक अत्यंत प्रतिभाशाली और राजसी कवि थे। उनकी बुद्धि और शीघ्र कविता रचने की शक्ति (शीघ्रकवि) इतनी प्रबल थी कि बड़े-बड़े राजा उनके कायल थे। अहंकार का त्याग: जब लाडू बारोट पहली बार श्रीजी महाराज से मिलने गढडा आए, तो वे उनके दिव्य स्वरूप को देखकर मंत्रमुग्ध हो गए। जहाँ वे दूसरों को अपनी कविताओं से प्रभावित करने आए थे, वहीं स्वयं भगवान के चरणों में समर्पित हो गए। उन्होंने अपना राजसी वैभव, आभूषण और अहंकार त्याग दिया और श्रीजी महाराज से दीक्षा की प्रार्थना की। महाराज ने उन्हें 'स्वामी श्रीरंगदास' और बाद में 'स्वामी ब्रह्मानंद' का नाम दिया। 2. भक्ति और वास्तुकला का संगम स्वामी ब्रह्मानंद केवल एक महान कवि ही नहीं, बल्कि एक कुशल वास्तुकार भी थे। उन्होंने वडताल, जूनागढ़ और अहमदाबाद जैसे विशाल मंदिरों के निर्माण में मुख्य भूमिका निभाई। चमत्कारिक घटना: मूली मंदिर के निर्माण के समय जब पानी और पत्थर की कमी हुई, तब स्वामी ने अनन्य भक्ति भाव से श्रीजी महाराज को याद किया। भगवान ने प्रकट होकर उन्हें एक गुप्त जल स्रोत और पत्थर की खान का मार्ग दिखाया, जिससे मंदिर का कार्य निर्बाध रूप से संपन्न हुआ। 3. शिक्षापत्री: सुखी जीवन के 10 स्वर्णिम सूत्र आपके द्वारा साझा किए गए चित्रों में भगवान स्वामीनारायण द्वारा रचित 'शिक्षापत्री' के कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण आज्ञावचनों का उल्लेख है। ये नियम आज के आधुनिक युग में भी मानसिक शांति और सामाजिक सद्भाव के लिए अनिवार्य हैं: अहिंसा परम धर्म: किसी भी जीव की हिंसा न करना, यहाँ तक कि छोटे जीव-जंतुओं को भी अनजाने में कष्ट न देना। शुद्ध आहार-विहार: बिना छना पानी और दूध न पीना। व्यसनों (भांग, शराब, जुआ) से पूरी तरह दूर रहना। सदाचार और ईमानदारी: चोरी न करना, किसी की वस्तु बिना आज्ञा न लेना और कभी किसी पर झूठा आरोप न लगाना। आत्महत्या का निषेध: कठिन से कठिन परिस्थिति में भी कभी आत्महत्या का विचार न करना। सेवा भाव: माता-पिता और गुरु की सेवा आजीवन अपनी शक्ति के अनुसार करना। मर्यादा का पालन: स्त्री और पुरुष दोनों को अपनी मर्यादा में रहना और व्यभिचार का त्याग करना। शालीनता: ऐसे वस्त्र न पहनना जिससे शरीर के अंग प्रदर्शित हों; हमेशा शालीन वस्त्र धारण करना। भक्ति का नियम: सुबह स्नान के बाद तिलक-चाँदला कर भगवान की पूजा करना। सत्य का मार्ग: शास्त्रों में बताए गए सदाचार का पालन करने वाला इस लोक और परलोक दोनों में सुखी रहता है। सत्शास्त्रों का सम्मान: अपनी मनमानी करने के बजाय शास्त्रों की मर्यादा में रहकर जीवन व्यतीत करना ही कल्याण का मार्ग है। 4. शास्त्रीजी महाराज का संकल्प लेख में ब्रह्मस्वरूप शास्त्रीजी महाराज के वचनों का भी उल्लेख है, जिन्होंने उपासना और सिद्धांतों की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। उनका मानना था कि श्रीजी महाराज की आज्ञा का पालन करना और अक्षर-पुरुषोत्तम की उपासना का प्रवर्तन करना ही जीवन का सर्वोत्तम कार्य है। निष्कर्ष स्वामी ब्रह्मानंद का जीवन हमें सिखाता है कि प्रतिभा का वास्तविक उपयोग भगवान की भक्ति में है। वहीं, शिक्षापत्री के नियम हमें एक जिम्मेदार और अनुशासित इंसान बनाते हैं। यदि हम इन शिक्षाओं को अपने जीवन में उतार लें, तो हम न केवल स्वयं सुखी रहेंगे, बल्कि समाज को भी एक बेहतर दिशा दे पाएंगे। Swami Brahmanand Life Story, Shikshapatri Teachings in Hindi, Lord Swaminarayan Principles, Ladu Barot to Swami Brahmanand, BAPS History, Spiritual Guidance Hindi, Sadachar and Ethics. #Swaminarayan #Shikshapatri #BrahmanandSwami #Spirituality #Hinduism #Inspiration #DivineWisdom #VadtalDham #BAPS #SanatanDharma #Satsang #Peace #Ethics #SpiritualAwakening #ViralPost