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आध्यात्मिक उन्नति के लिए गुरु की महत्ता आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर व्यक्ति मानसिक शांति और जीवन के असली अर्थ की तलाश में है। श्रीमद् भागवत (4/34) में कहा गया है: "तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।" इसका अर्थ है कि सद्गुणों की प्राप्ति और परमात्मा के साक्षात्कार के लिए हमें एक सच्चे गुरु की शरण में जाना चाहिए। विनम्रतापूर्वक प्रश्न पूछकर और उनकी सेवा करके ही हम आत्म-ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। जीवन की चुनौतियाँ और मार्गदर्शक की आवश्यकता लेख के अनुसार, जीवन का दूसरा नाम ही 'समस्या' है। मनुष्य जीवन भर इन समस्याओं से निकलने का प्रयास करता है, लेकिन सही मार्गदर्शन के अभाव में वह और अधिक उलझ जाता है। ऐसे समय में एक 'गुणातीत गुरु' की आवश्यकता होती है जो हमें निस्वार्थ भाव से सही रास्ता दिखा सके। प्रमुखस्वामी महाराज: एक दिव्य प्रकाशपुंज भगवान स्वामीनारायण की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले ब्रह्मस्वरूप प्रमुखस्वामी महाराज ने लाखों लोगों के जीवन को नई दिशा दी है। उनके मार्गदर्शन में लोग न केवल घरेलू समस्याओं से मुक्त हुए हैं, बल्कि उन्होंने अपने स्वभावगत दोषों (क्रोध, लोभ, मोह) पर विजय प्राप्त कर 'अध्यात्म-स्थिति' को प्राप्त किया है। इस शिक्षा का मुख्य सार: आत्म-ज्ञान: आत्मा को समझना ही दुखों का अंत है। गुरु सेवा: गुरु के बताए मार्ग पर चलना ही सच्ची प्रगति है। शाश्वत आनंद: सांसारिक सुख क्षणिक हैं, जबकि गुरु के सान्निध्य से प्राप्त होने वाली शांति स्थायी है। विस्तृत लेख: जीवन रूपांतरण का मार्ग 1. प्रस्तावना: आधुनिक युग और आध्यात्मिक प्यास आज का युग तकनीक और सुख-सुविधाओं का युग है, फिर भी तनाव और अवसाद (Depression) बढ़ रहा है। इसका मुख्य कारण आध्यात्मिक नींव की कमी है। 2. श्रीमद् भागवत का दिव्य संदेश श्रीमद् भागवत गीता और भागवत पुराण का सार हमें सिखाता है कि बिना गुरु के ज्ञान संभव नहीं है। 'प्रणिपात' यानी पूर्ण समर्पण ही ज्ञान का पहला सोपान है। 3. समस्याएँ और मनुष्य का संघर्ष जीवन में आने वाली आर्थिक, पारिवारिक और मानसिक बाधाओं को हम अक्सर अपने अहंकार से हल करना चाहते हैं। लेख स्पष्ट करता है कि उचित मार्गदर्शन के बिना मनुष्य भ्रम के जाल में फंसता जाता है। 4. स्वामीनारायण परंपरा और प्रमुखस्वामी महाराज का योगदान प्रमुखस्वामी महाराज ने 'दूसरे के भले में अपना भला' (In the joy of others lies our own) का मंत्र दिया। उन्होंने हजारों मंदिरों और अस्पतालों का निर्माण कराया, लेकिन उनका सबसे बड़ा कार्य था 'मानव निर्माण'। 5. स्वभावगत दोषों से मुक्ति क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार हमारे आंतरिक शत्रु हैं। गुरु की वाणी और उनका चरित्र हमें इन दोषों से मुक्त कर एक निर्मल व्यक्तित्व प्रदान करता है। 6. मुमुक्षुओं के लिए आत्म-शांति का मार्ग हजारों-लाखों 'मुमुक्षु' (मोक्ष की इच्छा रखने वाले) आज भी उनके जीवन से प्रेरणा लेकर आत्म-शांति का अनुभव कर रहे हैं। उनके शब्द आज भी अंधेरे में दीये के समान हैं। 7. निष्कर्ष: शाश्वत आनंद की प्राप्ति यदि हम अपने जीवन में शांति चाहते हैं, तो हमें अपनी आत्मा के करीब जाना होगा। यह यात्रा एक अनुभवी आध्यात्मिक मार्गदर्शक के बिना कठिन है। #SpiritualWisdom #PramukhSwamiMaharaj #BAPS #ShreemadBhagwat #Hinduism #Peace of Mind #GuruBhakti #Satsang #LifeLessons #HindiQuotes #Spirituality #SelfRealization #MotivationInHindi #SanatanDharma #DivineGuidance