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human species;इतिहास... गवाह नहीं होता। इतिहास... कातिल होता है। हम बचपन से सुनते आए हैं कि "मौत" इस दुनिया का वो सच है। जिसे पाना तो कई नही चाहता लेकिन इससे कोई बच भी नही सकता। लेकिन क्या आपने कभी उस मौत के बारे में सोचा है... जो एक इंसान की नही, बल्कि पूरी की पूरी इंसानी नस्ल की हो जाए? सोचिए... एक ऐसी दुनिया, जहाँ करोड़ों लोग सांस ले रहे थे, सपने देख रहे थे... और फिर अचानक... सब कुछ धुएं की तरह गायब हो गया। अगर आपको भी अभी तक यही लगता है कि विलुप्त सिर्फ डायनासोर हुए? या मैमथ हुए? तो तैयार हो जाइये... क्योंकि आज आपका यह भ्रम हमेशा हमेशा के लिए टूटने वाला है। वैज्ञानिकों ने ज़मीन के नीचे दबे एक ऐसे राज़ को खोद निकाला है, जिसने उनकी रूह को कंपा दिया। इस धरती पर... हम अकेले नहीं थे। हमसे पहले... और हमारे साथ... इंसानों की 9 अलग-अलग प्रजातियां मौजूद थी। जी हां, 9 तरह के इंसान कभी इस दुनिया मे रहा करते थे! इंसानो की ये प्रजातियां अब विलुप्त हो चुकी है। जो हमसे ज्यादा ताकतवर थे। हमसे ज्यादा साहसी थे। लेकिन आज... उनका एक भी वारिस ज़िंदा नहीं है। अब जरा रुकिए... और हमसे एक गहरा सवाल पूछिए। अगर वे इतने ताकतवर थे... तो वे गए कहाँ? क्या कुदरत ने उन्हें मार दिया? या फिर... उन्हें किसी और ने मिटाया? शायद इसका जवाब... आपके घर के आईने में छिपा हो। जब आप शीशे में अपनी शक्ल देखते हैं... तो आपको क्या दिखता है? एक "बुद्धिमान इंसान"? गलत। शायद आप एक "सीरियल किलर" के वंशज को देख रहे हैं। शायद आप उसे देख रहे हो जिसमे इंसानो की उन 9 प्रजातियों के साथ बहुत ही घिनौना काम किया हो। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि हम आज यहां सिर्फ इसलिए ज़िंदा नहीं हैं कि हम "खास" थे। हम इसलिए ज़िंदा हैं... क्योंकि शायद हमने अपने ही चचेरे भाइयों का नरसंहार किया था। हमारा यह चेहरा... किसी चमत्कार से नहीं मिला... यह कई प्रजातियों पर किए गए घिनौने अत्याचारों की निशानी है। लेकिन... कहानी यहां खत्म नहीं होती। सच्चाई यह है कि वे पूरी तरह मरे नहीं हैं। उनका DNA... उनका 'खून' आज भी हम में से कई लोगों के अंदर बह रहा है। "तो... वे 'ग़ायब' कैसे हुए? और उनका 'हिस्सा' हमारे 'अंदर' क्या कर रहा है?" क्या उनके ओर हमारे बीच वाकई कोई संबंध था और आज भी है। क्या हमने उन्हें 'मारा' था? या... फिर इसका सच कुछ और भी ज़्यादा 'करीबी' और 'जटिल' है?" यह एक "कड़वा सच" है, सिर्फ़ 50 हजा साल पहले... यह ग्रह 'इंसानों' की कई अलग-अलग प्रजातियों से भरा हुआ था। यह 'हमारा' ग्रह नहीं था, यह 'उनका' ग्रह था। वे हमसे ज़्यादा मज़बूत थे। वे ठंडे मौसम के लिए बेहतर बने थे। वे भी 'सोच' सकते थे, 'शिकार' कर सकते थे, और 'प्यार' भी कर सकते थे। "वे हमारे 'भाई' थे। और वे सब... विलुप्त हो गए। "तो... आख़िर हुआ क्या? हम, 'होमो सेपियन्स', इस 'पारिवारिक युद्ध' में अकेले 'जीवित' कैसे बच गए?" क्या उनके विलुप्ती सच इतना भी सीधा नही है जितना हम समझते है। क्या आपमें इतनी हिम्मत है कि आप इतिहास के उस प्रतिबंधित दरवाजे के खोलने से निकलने वाले सच को सुन सके? क्या आप तैयार हैं उस सच का सामना करने के लिए, जिसे जानने के बाद... शायद आप खुद से नज़रे न मिला पाएं? अगर हाँ, तो चलिए... 3 लाख साल पीछे चलते हैं। उस दौर में, जहां इंसान... इंसान का शिकार करता था। यह सिर्फ इतिहास नहीं है। यह आपकी दबी हुई असलियत है। #Homosapiens #humanspecies #Neanderthal #Homoerectus #Homoheidelbergensis #Homohabilis #Documentary