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स्कन्दपुराण के काशीखण्ड एवं अन्य सनातन धर्मशास्त्रों के अनुसार कैलास पर देवी पार्वती ने भगवान शिव से श्वेतेश्वर महादेव का माहात्म्य पूछा। भगवान शिव ने बताया कि सत्ययुग में श्वेत नाम के एक महान मुनि हुए। संसार की नश्वरता और मृत्यु के भय से व्याकुल होकर वे काशी आए और संवर्तेश्वर के पश्चिम एक दिव्य स्थान पर सहस्र वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। तब श्वेत मुनि ने वहाँ शिवलिंग की स्थापना की, जो उनके नाम से श्वेतेश्वर कहलाया। यह लिंग अकाल मृत्यु का नाश करने वाला, कष्टों को दूर करने वाला और मोक्ष प्रदान करने वाला है। एक समय मृत्यु स्वयं श्वेत मुनि को लेने आई, पर वे अपने स्थापित शिवलिंग की शरण में चले गए। तब भगवान शिव ने मृत्यु को रोक दिया और मुनि को मृत्युञ्जय बना दिया। जो भक्त श्रद्धा से श्वेतेश्वर के दर्शन करता है, उसे यम का भय नहीं रहता, रोग-दरिद्रता दूर होती है और अंत में शिवलोक की प्राप्ति होती है। माघ शुक्ल चतुर्दशी के दिन उनकी पूजा करने से हजार अश्वमेध यज्ञ के समान फल मिलता है, और बिल्वपत्र आदि से पूजन करने वाला भक्त परम गति को प्राप्त होता है। तल्लिङ्गमर्चयेद्यो वै तस्य सिद्धिः करे स्थिता । संवर्तेशात् पश्चिमतो लिङ्गं पूर्वामुखं स्थितम् ॥५१ श्वेतेश्वरं तु विख्यातं श्वेतेन स्थापितं पुरा। तेन दृष्टेन लिङ्गेन गाणपत्यं लभेद् ध्रुवम् ॥ ५२ संवर्तेश्वर के पश्चिम में एक पूर्वाभिमुख लिङ्ग स्थित है। वह श्वेतेश्वर नाम से विख्यात है, उसे पूर्व काल में श्वेत मुनि ने स्थापित किया था। उस लिङ्ग के दर्शन से मनुष्य निश्चित रूप से गाणपत्य प्राप्त करता है। पता-श्वेतेश्वर महादेव, सिद्धेश्वरी गली, चौक वाराणसी , (चुन्नी साव मिठाई वाले के सामने ) #varanasi #kashi #mahadev #kashivishwanath #skandapurana #sanatandharma #spiritualindia #shiva #lordshiva