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#सनातन धर्मशास्त्रों एवं स्कन्दपुराण के काशीखण्ड के अनुसार काशीपुरी के सर्वश्रेष्ठ अविमुक्त महाक्षेत्र में अवस्थित भगवान अविमुक्तेश्वर विश्वेश्वर के भवन की अन्तगृह यात्रा क्रम में वर्णित है कि--सर्वप्रथम प्रातःकाल स्नान कर पंचविनायकों के नमस्कार करने के उपरान्त मुक्तिमण्डप में बैठकर विश्वेश्वर विश्वनाथ को प्रणाम करे फिर "मैं समस्त पापों की शान्ति के लिये अन्तर्गृह की यात्रा करूंगा" इस प्रकार से संकल्प कर मणिकर्णिका पर जावे- अन्तर्गृहस्य वै यात्रा कर्तव्या प्रतिवासरम् ।। ७६ प्रातः स्नानं विधायादौ नत्वा पञ्चविनायकान् । नमस्कृत्वाथ विश्वेशं स्थित्वा निर्वाणमण्डपे ।। ७७ अन्तर्गृहस्य यात्रा वै करिष्ये घौघशांतये ।।७८ #तत्पश्चात् यात्रा क्रम में कहे गए देवस्थानों पर देवता के पूजन उपरांत- दण्डपाणिं महेशं च मोक्षेशं प्रणमेत्ततः। ९४ दण्डपाणि, महेश्वर, मोक्षेश्वर को प्रणाम करे। #शास्त्रों में वर्णित है कि भगवान् शिव का ‘मोक्षेश्वर’ स्वरूप अत्यंत गूढ़, पावन तथा समस्त पापों का नाश करने वाला है। सत्ययुग में जब मुमुक्षु मुनियों ने मोक्ष की प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या की, तब उनके निष्कपट तप से प्रसन्न होकर भगवान् शिव काशी के अविमुक्त क्षेत्र में ज्योतिर्मय स्वरूप से प्रकट हुए। अविमुक्तेश्वर के वामभाग में प्रतिष्ठित यही मोक्षेश्वर, शिव के सघन दिव्य तेज का मूर्त एवं करुणामय प्राकट्य माने जाते हैं। #भगवान् मोक्षेश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन मात्र से साधक को ऐसा दुर्लभ एवं परम पावन पुण्य प्राप्त होता है, जो अनंत कोटि तीर्थों के सेवन से भी सहज उपलब्ध नहीं होता। जो जीव संसाररूपी बंधनों से मुक्त होने की तीव्र अभिलाषा लेकर उनके पावन सान्निध्य में श्रद्धापूर्वक ‘शिव’ नाम का जप करता है, उसके लिए समस्त चराचर जगत मानो वश में हो जाता है और मोक्ष उसके करतल में स्थित अमूल्य रत्न के समान सुलभ हो जाता है। #जो साधक गंगास्नान के उपरांत शुद्ध मन और निष्कलुष भाव से भगवान् मोक्षेश्वर का दर्शन करता है, उसके संचित पाप क्षीण हो जाते हैं तथा उसके जीवन-पथ पर मोक्ष का द्वार स्वयं उद्घाटित हो जाता है। जो श्रद्धालु भक्त बिल्वपत्र और पुष्पों से विधिपूर्वक उनकी पूजा करते हैं, उनके गृह में स्वयं श्री लक्ष्मी का स्थायी निवास होता है। जीवन के अंतिम क्षण में वे शिवलोक को प्राप्त होकर सायुज्य-मुक्ति के परम पद को प्राप्त करते हैं,जहाँ पुनर्जन्म का चक्र नहीं, अपितु शिव-सान्निध्य का अखंड, अद्वैतमय आनन्द ही शेष रहता है। अविमुक्तसमीपेऽच्र्यो मोक्षेशो मोक्षबुद्धिदः । करुणेशो दयाधाम तदुदीच्यां समर्चयेत् ॥ २२३ #भगवान अविमुक्तेश्वर के समीप ही मोक्ष की बुद्धि देने वाले मोक्षेश्वर पूजनीय हैं। उनके उत्तर दिशा में दया के धाम करुणेश्वर का पूजन करना चाहिए। #पता- मोक्षेश्वर महादेव मंदिर , विश्वनाथ गली , ढूंढीराज गली मार्ग, वर्तमान नंदूफरिया गली, ढुंढिराज गली मार्ग, ज्ञानवापी गेट नंबर 4 वाराणसी #varanasi #kashi #mahadev #kashivishwanath #sanatandharma #spiritualindia #skandapurana #shiva #lordshiva