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तथागत भगवान गौतम बुद्ध का जीवन परिचय तथागत भगवान गौतम बुद्ध, जिन्हें सिद्धार्थ गौतम के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरुओं में से एक थे। वे बौद्ध धर्म के संस्थापक थे और उनकी शिक्षाओं ने न केवल भारत, बल्कि पूरे विश्व में लाखों लोगों को प्रभावित किया। आइए, उनके जीवन, शिक्षाओं और प्रभाव के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करें: जीवन परिचय जन्म: सिद्धार्थ गौतम का जन्म 563 ईसा पूर्व (अनुमानित) में लुंबिनी (वर्तमान में नेपाल) में हुआ था। वे शाक्य वंश के राजा शुद्धोधन और रानी माया के पुत्र थे। प्रारंभिक जीवन: सिद्धार्थ का पालन-पोषण एक राजकुमार के रूप में हुआ। उनके पिता ने उन्हें सांसारिक दुखों से दूर रखने की कोशिश की और उन्हें हर सुख-सुविधा प्रदान की। चार दृश्य: 29 वर्ष की आयु में, सिद्धार्थ ने पहली बार चार दृश्य देखे - एक वृद्ध व्यक्ति, एक रोगी, एक मृत शरीर और एक संन्यासी। इन दृश्यों ने उन्हें जीवन की सच्चाई (दुख, वृद्धावस्था, बीमारी और मृत्यु) से अवगत कराया और आध्यात्मिक खोज के लिए प्रेरित किया। महाभिनिष्क्रमण: सिद्धार्थ ने अपने परिवार, पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को छोड़कर सत्य की खोज के लिए घर त्याग दिया। यह घटना "महाभिनिष्क्रमण" के नाम से जानी जाती है। आत्मज्ञान की प्राप्ति तपस्या: सिद्धार्थ ने कई वर्षों तक कठोर तपस्या की और विभिन्न गुरुओं से शिक्षा ली, लेकिन उन्हें संतुष्टि नहीं मिली। उन्होंने अति-कठोर तप को भी अस्वीकार कर दिया। बोधि वृक्ष के नीचे ध्यान: 35 वर्ष की आयु में, गया (वर्तमान बिहार, भारत) में एक पीपल के वृक्ष (बोधि वृक्ष) के नीचे गहन ध्यान के दौरान उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद वे "बुद्ध" (जागृत) कहलाए। तथागत: आत्मज्ञान के बाद वे "तथागत" कहलाए, जिसका अर्थ है "जो सत्य को प्राप्त कर चुका है" या "जो वास्तविकता को समझ गया है"। बुद्ध की शिक्षाएँ बुद्ध की शिक्षाएँ जीवन के दुखों को समझने और उनसे मुक्ति पाने पर केंद्रित हैं। उनकी प्रमुख शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं: चार आर्य सत्य: दुख: जीवन में दुख है (जन्म, मृत्यु, बीमारी, वृद्धावस्था आदि)। दुख समुदाय: दुख का कारण तृष्णा (लालसा) और अज्ञानता है। दुख निरोध: दुख से मुक्ति संभव है। दुख निरोध गामिनी प्रतिपदा: दुख से मुक्ति का मार्ग अष्टांगिक मार्ग है। अष्टांगिक मार्ग: यह आठ सिद्धांतों का मार्ग है जो नैतिकता, ध्यान और प्रज्ञा पर आधारित है: सम्यक दृष्टि (सही दृष्टिकोण) सम्यक संकल्प (सही इरादा) सम्यक वाक् (सही वाणी) सम्यक कर्म (सही कार्य) सम्यक आजीविका (सही आजीविका) सम्यक प्रयास (सही प्रयास) सम्यक स्मृति (सही स्मरण) सम्यक समाधि (सही ध्यान) अनित्य, अनात्मा और दुख: बुद्ध ने सिखाया कि सभी चीजें अनित्य (अस्थायी) हैं, आत्मा का कोई स्थायी स्वरूप नहीं है (अनात्मा), और जीवन में दुख स्वाभाविक है। करुणा और अहिंसा: बुद्ध ने सभी प्राणियों के प्रति करुणा और अहिंसा पर जोर दिया। प्रचार और संघ की स्थापना प्रथम उपदेश: आत्मज्ञान के बाद, बुद्ध ने अपना पहला उपदेश वाराणसी के पास सारनाथ में दिया, जिसे "धर्मचक्र प्रवर्तन" कहा जाता है। यहाँ उन्होंने चार आर्य सत्यों की व्याख्या की। बौद्ध संघ: बुद्ध ने भिक्षुओं और भिक्षुणियों का एक संघ स्थापित किया, जो उनकी शिक्षाओं को फैलाने में सहायक हुआ। उनके अनुयायियों में राजा बिंबिसार, अशोक (बाद में) और सामान्य लोग शामिल थे। निर्वाण महापरिनिर्वाण: 80 वर्ष की आयु में, 483 ईसा पूर्व (अनुमानित) में कुशीनगर (वर्तमान उत्तर प्रदेश, भारत) में बुद्ध ने अपना शरीर त्याग दिया। इसे "महापरिनिर्वाण" कहा जाता है, जो पूर्ण मुक्ति का प्रतीक है। अंतिम शब्द: उनके अंतिम शब्द थे, "सभी संन्यासी नश्वर हैं, अपने प्रयास से मुक्ति प्राप्त करो।" प्रभाव और विरासत बौद्ध धर्म का प्रसार: बुद्ध की मृत्यु के बाद, उनके शिष्यों और सम्राट अशोक जैसे शासकों ने बौद्ध धर्म को भारत से बाहर श्रीलंका, तिब्बत, चीन, जापान, कोरिया और दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैलाया। साहित्य: बुद्ध की शिक्षाएँ त्रिपिटक (विनय पिटक, सूत्र पिटक, अभिधम्म पिटक) में संकलित हैं, जो पालि भाषा में लिखे गए हैं। प्रतीक: बोधि वृक्ष, धर्मचक्र, और बुद्ध की मूर्तियाँ उनकी शिक्षाओं के प्रतीक हैं। आधुनिक संदर्भ में बुद्ध आज भी बुद्ध की शिक्षाएँ ध्यान, mindfulness, और शांति के लिए प्रासंगिक हैं। बौद्ध धर्म के विभिन्न संप्रदाय जैसे थेरवाद, महायान और वज्रयान उनके विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी अहिंसा और करुणा की शिक्षा विश्व भर में शांति के संदेश के रूप में प्रतिध्वनित होती है। यदि आपको किसी विशेष पहलू जैसे उनके उपदेशों, जीवन की घटनाओं या बौद्ध धर्म के प्रसार के बारे में और जानना हो, तो बताइए!