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त्रिफला एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक रासायनिक फ़ार्मुला है जिसमें अमलकी (आंवला (Emblica officinalis)), बिभीतक (बहेडा) (Terminalia bellirica) और हरितकी (हरड़ Terminalia chebula) को बीज निकाल कर (1 भाग हरड, 2 भाग बहेड़ा, 3 भाग आंवला) 1:2:3 मात्रा में लिया जाता है। त्रिफला शब्द का शाब्दिक अर्थ है "तीन फल"। संयमित आहार-विहार के साथ त्रिफला का सेवन करने वाले व्यक्तियों को हृदयरोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, नेत्ररोग, पेट के विकार, मोटापा आदि होने की संभावना नहीं होती। यह कोई 20 प्रकार के प्रमेह, विविध कुष्ठरोग, विषमज्वर व सूजन को नष्ट करता है। अस्थि, केश, दाँत व पाचन-संस्थान को बलवान बनाता है। इसका नियमित सेवन शरीर को निरामय, सक्षम व फुर्तीला बनाता है। यदि गर्म पानी के साथ सोते समय एक चम्मच ले लिया जाए तो क़ब्ज़ नही रहता। त्रिफला पाचन और भूख को बढ़ाने, लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि करने और शरीर में वसा की अवांछनीय मात्रा को हटाने में सहायता के लिए इस्तेमाल किया जाता है।मुँह में घुलने पर त्रिफला का उपयोग रक्त के जमाव और सिर दर्द को दूर करने के लिए किया जाता है। इसके अन्य फ़ायदों में रक्त शर्करा के स्तरों को बनाए रखने में मदद करना और त्वचा के रंग और टोन में सुधार लाना शामिल हैं। भारत में एक लोकप्रिय कहावत है, "माँ नहीं है? यदि आपके पास त्रिफला है, तो आपको चिंता करने की ज़रूरत नहीं है" इसका सार यह है कि जिस तरह माँ अपने बच्चों की देखभाल करती है, उसी तरह त्रिफला शरीर के आंतरिक अंगों की देखभाल कर सकता है। त्रिफला की तीनों जड़ीबूटियाँ आंतरिक सफाई को बढ़ावा देती हैं, जमाव और अधिकता की स्थिति को कम करती हैं तथा पाचन एवं पोषक तत्वों के सम्मिलन को बेहतर बनाती हैं। Puri (2003) में, आंवला के तहत रसायन में इस यौगिक मिश्रण के तीन महत्वपूर्ण घटकों (आमलाकी, हरिताकी और बिभिताकी) से जुड़े विवादों, साथ ही आयुर्वेद में इसके उपयोग, इससे बनाई जाने वाली विभिन्न औषधियों और उनके औषधीय और चिकित्सीय गुणों की चर्चा की गई है।