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यह भजन श्रीराम और श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप को एक ही परम सत्य के रूप में प्रस्तुत करता है। युग बदले, परिस्थितियाँ बदलीं, पर धर्म का मार्ग अडिग रहा। कभी मर्यादा बनकर राम आए, तो कभी विवेक और कर्म का संदेश लेकर कृष्ण। यह रचना हमें सिखाती है कि जीवन सरल हो तो संयम अपनाओ, और कठिन हो तो बुद्धि। एक ही प्रभु, अनेक लीला — यही सनातन सत्य है। [ALAP] aa… na… om… sa re ga ma… da pa… [VERSE 1] नाम सुमिरन से दुख मिटालो, मन के अँधियारे दूर भगालो। श्वास-श्वास में हरि को धारो, जीवन पथ को सरल बनालो॥ [CHORUS – repeat softly] राम भी वही, कृष्ण भी वही, नाम अलग, सत्य वही। राम भी वही, कृष्ण भी वही, नारायण की लीला यही॥ [VERSE 2] एक ही प्रभु ने रूप रचाए, युग के संग-संग पथ दिखलाए। कभी मर्यादा बनकर आए, कभी प्रेम का राग सुनाए॥ [CHORUS – repeat softly] राम भी वही, कृष्ण भी वही, नाम अलग, सत्य वही। [VERSE 3] वन की राह में राज छोड़ा, वचन निभाया, मन न तोड़ा। त्याग बना जब धर्म का दीप, राम बने जन-जन के प्रतीक॥ [VERSE 4] बंसी बोली, मन हर जाए, गीता में जीवन समझाए। जहाँ नियम बंधन बन जाए, कृष्ण वहाँ विवेक जगाए॥ [VERSE 5] काल बदला, बदली चाल, धर्म रहा हर युग विशाल। रूप अनेक, भाव समान, सत्य बना युग की पहचान॥ [VERSE 6] जब रावण का गर्व बढ़ा, राम बने, अधर्म लड़ा। जब छल ने रूप नया अपनाया, कृष्ण बने, धर्म बचाया॥ [VERSE 7] जब जीवन सरल, नियम निभाओ, जब जीवन कठिन, बुद्धि लगाओ। राम सिखाएँ संयम भाव, कृष्ण सिखाएँ कर्म प्रभाव॥ [VERSE 8] मीरा जैसा प्रेम जगा लो, नाम सुमिरन से दुख मिटा लो। रूप भुला, भाव अपनाओ, एक नारायण को मानो॥ [FINAL CHORUS – slow and emotional] राम भी वही, कृष्ण भी वही, एक ही प्रभु, सत्य सही। राम भी वही, कृष्ण भी वही, नारायण की लीला यही॥