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सदा न संग सहेलियाँ, सदा न राजा देश। सदा न जुग में जीवणा, सदा न काला केश॥ सदा न फूलै केतकी, सदा न सावन होय। सदा न विपदा रह सके, सदा न सुख भी होय॥ सदा न मौज बसन्त री, सदा न ग्रीष्म भाण। सदा न जोवन थिर रहे, सदा न संपत माण॥ सदा न काहू की रही, गल प्रीतम की बांह। ढ़लते ढ़लते ढ़ल गई, तरवर की सी छाँह॥ यह पद्य जीवन की क्षणभंगुरता और अनित्यता को रेखांकित करता है। इसका भावार्थ और संदेश इस प्रकार है— भावार्थ / व्याख्या: न तो संग-सहेलियाँ सदा साथ रहती हैं, न ही किसी का राज-पाट स्थायी होता है। संसार में कोई भी जीव सदा नहीं जीता और न ही बाल हमेशा काले रहते हैं—यौवन और रूप दोनों ढलते हैं। केतकी का फूल सदा नहीं खिलता, सावन का मौसम भी स्थायी नहीं होता। विपत्ति हमेशा नहीं रहती, पर सुख भी सदा टिके नहीं रहते—दोनों आते-जाते हैं। न बसंत की मौज सदा रहती है, न ही ग्रीष्म की तपन स्थिर रहती है—ऋतुएँ बदलती रहती हैं। न यौवन स्थायी है, न ही धन-संपत्ति का भोग हमेशा बना रहता है। किसी के गले में प्रियतम की बाँहें भी सदा नहीं रहतीं—संबंधों का स्वरूप भी बदलता है। जैसे वृक्ष की छाया धीरे-धीरे ढलते हुए समाप्त हो जाती है, वैसे ही जीवन के सुख-संबंध भी समय के साथ ढल जाते हैं। मुख्य संदेश: यह रचना सिखाती है कि इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है—सुख, दुख, यौवन, वैभव, संबंध सभी क्षणिक हैं। इसलिए मनुष्य को अहंकार, आसक्ति और मोह से मुक्त रहकर संयम, विवेक और संतुलन के साथ जीवन जीना चाहिए। परिवर्तन को स्वीकार करना ही जीवन का सत्य है।