У нас вы можете посмотреть бесплатно Shri Kaal Bhairav Ashtakam | श्री कालभैरव अष्टकम् | Rajesh Nakar | काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे или скачать в максимальном доступном качестве, видео которое было загружено на ютуб. Для загрузки выберите вариант из формы ниже:
Если кнопки скачивания не
загрузились
НАЖМИТЕ ЗДЕСЬ или обновите страницу
Если возникают проблемы со скачиванием видео, пожалуйста напишите в поддержку по адресу внизу
страницы.
Спасибо за использование сервиса ClipSaver.ru
श्री कालभैरव अष्टकम् आदिगुरु शंकराचार्यजी की अद्वितीय रचनाओं मेसे एक है, यह दिव्य स्तोत्र भगवान कालभैरव के विकराल और भयंकर स्वरूप की स्तुति करता है, भगवान काल भैरव का रूप उग्र और प्रचंड है लेकिन वे बहुत ही भोले और सरल स्वभाव के हैं एवं अपने भक्तों की रक्षा के लिए वे सदैव तत्पर रहते हैं, यह स्तोत्र के माध्यम से आदिगुरु शंकराचार्यजी कहते है बाबा काल भैरव तो ज्ञान और मुक्ति दोनों ही प्रदान करने वाले है, आइये इस पुनीत पावन अवसर पर हम सब साथ मिल कर अष्ट सिद्धि प्रदान करने वाले काशी के नाथ कालभैरवजी की स्तुति श्री कालभैरव अष्टक के माध्यम से करे "काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे" देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥ १॥ भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम । कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥२॥ शूलटङ्कपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम । भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥३॥ भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम । विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥४॥ धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकं कर्मपाशमोचकं सुशर्मदायकं विभुम । स्वर्णवर्णशेषपाशशोभिताङ्गमण्डलं काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ ५॥ रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरञ्जनम । मृत्युदर्पनाशनं कराळदंष्ट्रमोक्षणं काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥६॥ अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसन्ततिं दृष्टिपातनष्टपापजालमुग्रशासनम । अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकन्धरं काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥७॥ भूतसङ्घनायकं विशालकीर्तिदायकं काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम । नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥८॥ कालभैरवाष्टकं पठन्ति ये मनोहरं ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम । शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनं ते प्रयान्ति कालभैरवाङ्घ्रिसन्निधिं ध्रुवम ॥९॥