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महाभारत के युद्ध में एक समय ऐसा आया जब अर्जुन के सामने जयद्रथ वध की प्रतिज्ञा थी और परिस्थिति अत्यंत कठिन हो चुकी थी। तब स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवान शिव की शरण में जाने का मार्ग बताया। उसी समय श्रीकृष्ण और अर्जुन ने मिलकर रुद्राभिषेक करते हुए जो दिव्य स्तोत्र का उच्चारण किया, वह स्तोत्र रुद्राभिषेक स्तोत्र के नाम से जाना जाता है, यह स्तुति से प्रसन्न होकर महादेव ने अर्जुन को दिव्य शक्ति और विजय का आशीर्वाद दिया। अथ रुद्राभिषेकस्तोत्रम् महाभारतान्तर्गतम् श्री कृष्णार्जुनावूचतु: नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च | पशूनां पतये नित्यं उग्राय च कपर्दिने || 1 || महादेवाय भीमाय त्र्यंबकाय च शांतये | ईशानाय मखध्नाय नमोस्त्वन्धकघातिने || 2 || कुमार गुरुवे तुभ्यं नीलग्रीवाय वेधसे | पिनाकिने हविष्याय सत्याय विभवे सदा || 3 || विलोहिताय धूम्राय व्याधायानपराजिते नित्यं नीलशिखण्डाय शूलिने दिव्यचक्षुषे || 4 || हन्त्रे गोप्त्रे त्रिनेत्राय व्याधाय वसुरेतसे अचिन्त्याम्बिकाभर्त्रे सर्वदेवस्तुताय च || 5 || वृषध्वजाय मुण्डाय जटिने ब्रह्मचारिणे तप्यमानाय सलिले ब्रह्मण्यायाजिताय च || 6 || विश्वात्मने विश्वसृजे विश्वमावृत्य तिष्ठते नमो नमस्ते सेव्याय भूतानां प्रभवे सदा || 7 || ब्रह्मवक्त्राय सर्वाय शंकराय शिवाय च नमोस्तु वाचस्पतये प्रजानां पतये नमः || 8 || नमो विश्वस्य पतये महतां पतये नमः नमः सहस्त्रशिरसे सहस्त्रभुजमृत्यवे सहस्त्रनेत्रपादाय नमोसंख्येयकर्मणे || 9 || नमो हिरण्यवर्णाय हिरण्यकवचाय च | भक्तानुकम्पिने नित्यं सिध्यतां नो वर: प्रभो || 10 || संजय उवाच एवं स्तुत्वा महादेवं वासुदेवः सहार्जुनः | प्रसादयामास भवं तदा ह्यस्त्रोपलब्धये || 11 || इति श्रीमन्महाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि अर्जुनस्वप्ने अशीतितमोध्यायान्तगॅतम् रुद्राभिषेक स्तोत्रम् संपूर्णम्