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जंगल में मुनिराज अहो, मंगल स्वरूप निज ध्यावें। बैठ समीप संत चरणों में, पशु भी बैर भुलावें ।। अरे सिंहनी गौ वत्सों को, स्तनपान कराती । हो निशंक गौ सिंह सुतों पर, अपनी प्रीति दिखाती ।। न्योला अहि मयूर सब ही मिल, तहाँ आनन्द मनावें ।। बैठ समीप संत चरणों में, पशु भी बैर भुलावें ।। नहीं किसी से भय जिनको, जिनसे भी भय न किसी को। निर्भय ज्ञान गुफा में रह, शिव-पथ दर्शायें सभी को ।। जो विभाव के फल में भी, ज्ञायक स्वभाव निज ध्यावें ।। बैठ समीप संत चरणों में, पशु भी बैर भुलावें ।। वेदन जिन्हें असंग ज्ञान का, नहीं संग में अटकें। कोलाहल से दूर स्वानुभव, परम सुधारस गटकें ।। भवि दर्शन उपदेश श्रवण कर, जिनसे शिवपद पावें ।। । बैठ समीप संत चरणों में, पशु भी बैर भुलावें ।। ज्ञेयों से निरपेक्ष ज्ञानमय, अनुभव जिनका पावन। शुद्धातम दर्शाती वाणी, प्रशममूर्ति मनभावन ।। अहो ! जितेन्द्रिय गुरू अतीन्द्रिय, ज्ञायक गुरु दरशावें ।। बैठ समीप संत चरणों में, पशु भी बैर भुलावें ।। निज ज्ञायक ही निश्चय गुरुवर, अहो दृष्टि में आया। स्वयं सिद्ध ज्ञानानन्द सागर, अन्तर में लहराया।। नित्य निरंजन रूप सुहाया, जाननहार जनावें। बैठ समीप संत चरणों में, पशु भी बैर भुलावें ।। जंगल में मुनिराज अहो, मंगल स्वरूप निज ध्यावें।बैठ समीप संत चरणों में, पशु भी समकित पावे।।